अवतार का अर्थ है अवतरण अर्थात अवतरित होना

  • 2016-05-24 12:30:03.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

अवतार का अर्थ
अवतार यानि अवतरित होना न कि जन्म लेना, प्रकट होना जिस प्रकार क्रोध प्रकट होता है वह अवतरित नही होता उसे तो अहंकार जन्म देता है परन्तु अवतार का जन्म नही होता जन्म दो के संयोग से प्राप्त होता है, जैसे अहंकार और इष्र्या का संयोग क्रोध जन्मता है।लोक मान्यता है कि अवतार अपनी लीला के द्वारा व्यावहारिक रूप से अर्थात प्रेक्टिकली कर्म कर के दिखाता है।जो - जो कर्म अवतार करता है, उसे अन्य सहायक अवतार नही कर पाते वह उनका बखान प्रचार करने वाले प्रचारक मात्र भर होते हैं बाकि रही बात अंश की हर जड़-चेतन भूत प्राणी उसी एक परमात्मा का अंश मात्र होता है। अवतार लेने के समय भगवान माया को अपने अधीन कर लेते हैं।

अवतार का अर्थ है अवतरण। प्रश्न उत्पन्न होता है कि किसका अवतरण ?

इसका स्पष्ट वर्णन करते हुए महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास ने श्रीमद्भगवद्गीता में योगीराज श्रीकृष्ण के मुख से कहलवाया है कि जो - जो जगत् में वस्तु, शक्ति विभूति श्रीसम्पन्न हैं ,वे जान मेरे तेज के ही अंश से उत्पन्न हैं ।

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18-40 में अंकित है -

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ - श्रीमद्भगवद्गीता 10-41

अर्थात - (यत् तत् विभूतिमत्) जो - जो ऐश्वर्ययुक्त , (सत्वम्) श्रेष्ठ पदार्थ हैं , (श्रीमत् ऊर्जितम् एव) अथवा कान्तियुक्त तथा शक्तियुक्त भी हैं।

(तत् तत् एव त्वं अवगच्छ) तुम उसे (मम तेजोंऽश सम्भवम्) मेरे तेज के अंश से उत्पन्न समझों।

स्मरणत: भगवदगीता में मम् मया इत्यादि शब्दों से अभिप्राय परमात्मा के और परमात्मा से समझना चाहिए।

इस प्रकार श्लोक का अभिप्राय यह बनता है कि इस संसार में जो - जो ऐश्वर्य , कान्ति और शक्तियुक्त पदार्थ हैं, सब परमात्मा के तेज के एक अंश से ही बने हैं।

यह सर्वविदित तथ्य है कि प्रत्येक प्राणी में प्राण (कार्य करने की शक्ति) परमात्मा की ही देन है। ब्रह्मसूत्र 1-3-18

में भी कहा है कि वाकादि इन्द्रियों के कार्यों से (प्राणी में) उस परमात्मा के चिह्न का पता चलता है।

तत्पश्चात लिखा है कि यह अर्थात प्राण शक्ति उसने इतर (जीवात्मा) की सलाह से कार्य करने के लिए दी हुई है।

अभिप्राय यह है कि प्राणियों के प्राण अर्थात कार्य करने की शक्ति परमात्मा की है और जो विशेष विभूतियुक्त श्रीमत् और ऊर्जितम् पदार्थ अथवा प्राणी होते हैं , उनमे परमात्मा की विशेष शक्ति होती है। ऐसे प्राणी ही परमात्मा का अवतार कहाते हैं।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आर्य इतिहास में जिस - जिस अवतार का वर्णन आया है , वे परमात्मा की विशेष प्राण - शक्ति को रखने वाले थे।इन अवतारों की गणना पुराणों में कराई गई है , ये सब ऐतिहासिक व्यक्ति हुए हैं।वास्तव में पुरातन भारतीय परम्परा (पद्धति) में इतिहास इन अवतारों का ही इतिहास है। यह पुराणों में मिलता है . इस कारण पुराण इतिहास के अंग हैं।

यह स्मरण रखा जाये कि यह आवश्यक नहीं कि अवतार मनुष्य - तुल्य प्राणी ही हो। मुख्य बात जो एक अवतार में देखने की है , वह है उसमें ईश्वरीय शक्ति . यहाँ यह भी स्मरण रखनी चाहिए कि परमात्मा का तेज अर्थात प्राण तो जीवों में भी है और निर्जीव वस्तुओं में भी है। जब परमात्मा की विशेष शक्ति किसी निर्जीव पदार्थ में होती है तो उसे देवता कहती है। जैसे अग्नि , इंद्र , वायु , वरुण इत्यादि। वे भी अवतार तब होते हैं जब वे इस सृष्टि में में विशेष ऐश्वर्ययुक्त अथवा सामथ्र्य युक्त कार्य करने के योग्य होते हैं।

महाभागवत् पुराण में अवतारों की गणना इस प्रकार है -

ब्रह्मा, 2. सनक, सनन्दन और सन्तकुमार, 3. वराह, 4. नारद, 5. नर -नारायण , 6. कपिल, 7. दत्तात्रेय, 8. यज्ञ, 9. ऋषभदेव, 10. पृथु, 11. मत्स्य, 12. कच्छ, 13. धन्वन्तरि, 14. मोहिनी, 15, नरसिंह, 16. वामन, 17. परशुराम, 18. व्यास, 19. राम, 20. कृष्ण , 21. बुद्ध ,22. कल्ङ्कि
इन अवतारों की गणना करने के उपरांत महाभागवत् पुराण का रचयिता पुराणकार कहता है-

अवतारा ह्यसंख्येया हरे: सत्वनिधेद्र्विजा ।
यथाविदासिन: कुल्या: सरस: स्यु: सहस्त्रश:।।
ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजश: ।
कला:सर्वे हरेरेव सप्रजापतयस्तथा ।।
-भागवत महापुराण 1-3-26, 27




अर्थात . जैसे एक सरोवर से हजारों नाले - नदियाँ निकलती हैं सत्वनिधि भगवान से सहस्त्रों ही अवतार हुए हैं।

वे ऋषि - मुनि , देव और मनु - पुत्र महान ओज वाले हुए हैं। यह वही बात हुई जो भगवद्गीता 10- 41  में कही गई है।

परमात्मा का तेज विशेष रूप में जब किसी पदार्थ अथवा प्राणी में आता है तो वह अवतार कहाता है।अवतार चेतन तत्व भी होते हैं और अचेतन तत्व भी। चेतन -  अचेतन का अन्तर है ईक्षण करने की शक्ति में। ईक्षण से अभिप्राय है कार्य करने का स्थान , काल और दिशा का निश्चय करना। जो ऐसा करने की सामथ्र्य रखता है उसे चेतन कहते हैं और जो नहीं रखता वह अचेतन कहाता है।

कुछ प्राकृतिक पदार्थ भी विशेष ओजयुक्त , ऐश्वर्यवान और सामथ्र्यवान देखे जाते हैं। उन्हें भी अवतार माना जाता है।यही पुराणों की पद्धति है। दोनों में अन्तर भी यहाँ स्पष्ट है। अचेतन अवतार एक कार्य के लिए ही होते हैं और उस कार्य के उपरान्त उनका अस्तित्व नहीं रहता। अचेतन अवतार इच्छानुसार अनेक कार्य करता है।

इस कथन का प्रमाण भी श्रीमद्भगवदगीता में ही उपस्थित है।परमात्मा की विशेष विभूति से युक्त पदार्थों की गणना गीता में की गई है। उस गणना में जहां राम और कार्तिकेय का कथन है , वहाँ उसमे वज्र और हिमालय का नाम भी है। जहां बृहस्पति ,भृगु को परमात्मा की विशेष विभूति वाला माना है , वहाँ अक्षरों में ओं (ओउम्) और समासों में द्वन्द्व को भी बताया है। इस प्रकार किसी भी पदार्थ को ,जिसमें परमात्मा के तेज का अंश है , उसे परमात्मा का अवतार माना है। अवतार परमात्मा स्वयं नहीं हो सकता। कृष्ण स्वयं परमात्मा नहीं थे। राम भी परमात्मा नहीं थे। इसी भान्ति बुद्ध तथा अन्य अवतार परमात्मा नहीं कहे जा सकते। वे केवल परमात्मा के तेज अर्थात प्राण की विशेष मात्र को रखने वाले होते हैं। अत: पुराणों में वंशों का चरित् (वंशानुचरित्) से अभिप्राय है कि इन अवतारों और उनसे संपन्न होने वाली घटनाओं का वर्णन।इस प्रकार भूमण्डल के इतिहास से अभिप्राय है अवतारों का इतिहास। .जन साधारण की गाथाएं भी पुराणों में हैं ,परन्तु इतने लम्बेकाल लगभग उनचालीस लाख वर्ष काल का इतिहास लिखने में केवल विशेष विभूति युक्त पदार्थो (अवतारों) का वर्णन ही किया सकता था। इन अवतारों का इतिहास का वर्णन कर दिए जाने से भूमण्डल विशेष रूप में भारतवर्ष का पूर्ण इतिहास इसमें आ जाता है।
-अशोक प्रवृद्ध