आवश्यकता है रिजर्व बैंक की स्वायत्तता की

  • 2016-07-13 09:30:41.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

 रिजर्व बैंक

अर्थव्यवस्था का संचालन इस प्रकार होना चाहिए कि निवेश भी बढ़े और नागरिक को माल भी सस्ता मिले। ये दोनों उद्देश्य साथ-साथ हासिल हो सकते हैं, यदि सरकार की खपत में कटौती करके उद्योगों को सबसिडी दी जाए। असल मुद्दा है कि सरकार की आय का उपयोग सरकारी कर्मियों को बढ़े हुए वेतन देने के लिए किया जाएगा अथवा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए। इस मूल मुद्दे पर रिजर्व बैंक का तनिक भी दखल नहीं है। वित्त मंत्री को चाहिए कि सरकारी खपत में कटौती तथा निवेश में वृद्धि की पालिसी बनाएं। यह मूल पालिसी सही रहेगी, तो रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता का लाभ ही होगा ।

रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर रघुराम राजन ने दूसरे कार्यकाल के लिए अपना नाम वापस ले लिया है। रिजर्व बैंक द्वारा देश की मुद्रा नीति को संचालित किया जाता है। राजन ने मुद्रा नीति का अपनी समझ के अनुसार स्वतंत्र संचालन किया था और सरकार के दबाव को दरकिनार किया था। इस कारण सरकार उनसे नाखुश थी। राजन को आभास हो गया होगा कि सरकार उन्हें दूसरा कार्यकाल देने के पक्ष में नहीं है। संभवतया इसलिए उन्होंने स्वयं अपना नाम वापस ले लिया है। सरकार चाहती है कि मुद्रा नीति पर उसका पूर्ण नियंत्रण रहे। सरकार निर्णय करे कि रिजर्व बैंक द्वारा कितने नोट छापे जाएंगे। यह निर्णय रिजर्व बैंक के गवर्नर पर न छोड़ा जाए। इस दिशा में सरकार द्वारा पहल पहले ही की जा चुकी है। पिछले बजट में व्यवस्था बनाई गई है कि मुद्रा नीति के निर्धारण को एक कमेटी बनाई जाएगी, जिसमें तीन सदस्यों को केंद्र सरकार नामित करेगी। मुद्रा नीति के निर्धारण में सरकार की भूमिका का विस्तार हो ही रहा है। सरकारी दखल के इस विस्तार को मुद्रा एवं टैक्स पालिसी के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। मुद्रा पालिसी के अंतर्गत निर्णय लिया जाता है कि रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर कितनी रखी जाएगी तथा कितनी मात्रा में नोट छापे जाएंगे। टैक्स पालिसी के अंतर्गत निर्णय लिया जाता है कि किस माल पर कितना टैक्स वसूल किया जाएगा और सरकारी राजस्व का उपयोग किस दिशा में किया जाएगा। अब तक की व्यवस्था में मुद्रा पालिसी पर रिजर्व बैंक का एकाधिकार रहता था और टैक्स पालिसी पर वित्त मंत्रालय का। दोनों ही पालिसी के माध्यम से खपत एवं निवेश के बीच देश की आय का बंटवारा किया जाता है।


मुद्रा पालिसी के अंतर्गत रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरें निर्धारित की जाती हैं। इनमें कटौती की जा सकती है। ऐसा करने पर उद्योगों द्वारा ऋण लेकर फैक्टरियां लगाना आसान हो जाएगा। ऋण की इस मांग की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक द्वारा अधिक मात्रा में नोट छापे जाएंगे। नोट छापने से महंगाई बढ़ेगी। मान लीजिए अर्थव्यवस्था में 100 रुपए के नोट प्रचलन में हैं। रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर घटाने से मुद्रा की मांग बढ़ी और रिजर्व बैंक ने 10 रुपए के अतिरिक्त नोट छाप कर अर्थव्यवस्था में डाल दिए। अर्थव्यवस्था में स्टील, सीमेंट, गेहूं आदि माल पूर्ववत उपलब्ध है। पूर्व में उपलब्ध माल को खरीदने को 100 रुपए के नोट अर्थव्यवस्था में घूम रहे थे। अब 110 रुपए के नोट घूमने लगे, जैसे उतने ही माल को खरीदने को अधिक संख्या में ग्राहक उपस्थित हो गए। इससे महंगाई बढ़ी। तदानुसार सभी नागरिकों को महंगा स्टील तथा गेहूं खरीदना पड़ा। अंतिम परिणाम रहा कि फैक्टरियों में निवेश बढ़ा तथा नागरिकों की खपत घटी। विशेष यह कि निवेश पहले बढ़ा और खपत बाद में घटी। टैक्स पालिसी का प्रभाव भी ऐसा ही होता है। मान लीजिए सरकार ने स्टील पर अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी आरोपित कर दी। बाजार में स्टील महंगा हो गया। नागरिकों को महंगा स्टील खरीदना पड़ा। उन्होंने मकान में अतिरिक्त कमरा बनाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। नागरिक की खपत में कटौती हुई। वसूले गए टैक्स से सरकार ने उद्यमियों को सबसिडी दी। इससे उद्योग लगाना सुलभ हो गया। निवेश बढ़ा। अंतिम परिणाम पूर्ववत रहा। नागरिकों की खपत कम हुई और उद्यमियों द्वारा निवेश अधिक हुआ। विशेष यह कि नागरिक की खपत पहले कम हुई और निवेश बाद में बढ़ा। स्टील पर टैक्स बढ़ाने के साथ महंगाई में तत्काल वृद्धि हुई। इस रकम से बाद में सबसिडी दी गई। तब निवेश में वृद्धि हुई।

मुद्रा पालिसी की एक और विशेषता है। नोट छापने के कारण बढ़ी महंगाई का प्रभाव संपूर्ण जनता पर, लेकिन हल्का पड़ता है। देश के हर नागरिक को हर वस्तु के दाम में मामूली बढ़त को झेलना पड़ता है जैसे सूर्य द्वारा तालाब से पानी धीरे-धीरे एवं सब ओर से उठाया जाता है, उसी तरह नोट छापने से हर नागरिक पर धीरे-धीरे दबाव बढ़ता है। टैक्स पालिसी की एक और समस्या है। इसका दुष्प्रभाव नागरिकों के विशेष वर्ग पर एवं तीखा पड़ता है। जैसे स्टील महंगा हो गया तो मकान बनाने वाले को अधिक मूल्य देना होगा, परंतु झुग्गी में रहने वाले पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। जाहिर है कि मुद्रा नीति तथा टैक्स नीति दोनों का अंतिम प्रभाव समान होता है। दोनों ही पालिसी के माध्यम से देश की आय के खपत एवं निवेश में बंटवारे को बदला जा सकता है। अंतर यह है कि मुद्रा पालिसी में निवेश पहले बढ़ता है, जबकि टैक्स पालिसी में बाद में बढ़ता है। दूसरा अंतर है कि मुद्रा पालिसी का प्रभाव सर्वव्यापी होता है, जबकि टैक्स पालिसी का प्रभाव वर्ग विशेष पर पड़ता है।

संभव है कि दोनों पालिसी में अंतर्विरोध पैदा हो जाए। जैसे सरकार द्वारा निवेश बढ़ाने के लिए स्टील पर टैक्स बढ़ाया गया और उद्योगों को सबसिडी दी गई, लेकिन उसी समय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। इससे उद्योग के लिए ऋण लेना कठिन हो गया। सरकार द्वारा दी गई सबसिडी से उद्योगों को जो प्रोत्साहन मिला, वह ब्याज दर में वृद्धि से निष्प्रभावी हो गया। वित्त मंत्रालय की पालिसी निष्प्रभावी हो गई। वित्त मंत्रालय चाहता है कि इस प्रकार के अंतर्विरोध पैदा न हों, इसलिए मुद्रा पालिसी को भी अपने अधिकार में लाना चाहता है। लेकिन मुद्रा एवं टैक्स पालिसी के समन्वय में खतरा भी है। मान लीजिए चुनाव नजदीक हैं। सत्तारूढ़ सरकार वोटर को प्रसन्न करना चाहती है। ऐसे में सरकार द्वारा टैक्स दर में कटौती की गई, जिससे नागरिक को राहत मिले और वह सत्तारूढ़ पार्टी को वोट दे। टैक्स दर में कटौती से सरकार के राजस्व में गिरावट आई। सरकार को वोट मिले, परंतु अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। ऐसे समय में रिजर्व बैंक की स्वायत्तता से हमें सरकार की इस गलत नीति से छुटकारा मिल सकता है। रिजर्व बैंक ब्याज दर में कटौती कर दे तो सरकार की गलत नीति निष्प्रभावी हो जाएगी।

रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता के लाभ-हानि दोनों हैं। वित्त मंत्रालय सही दिशा में चल रहा हो, तो रिजर्व बैंक की स्वायत्तता नुकसान देह हो सकती है। वित्त मंत्रालय गलत दिशा में चल रहा हो, तो वही स्वायत्तता लाभप्रद हो सकती है। वित्त मंत्रालय तथा रिजर्व बैंक के बीच इस तनातनी में मूल विषय पीछे छूट जाता है।

अर्थव्यवस्था का संचालन इस प्रकार होना चाहिए कि निवेश भी बढ़े और नागरिक को माल भी सस्ता मिले। ये दोनों उद्देश्य साथ-साथ हासिल हो सकते हैं, यदि सरकार की खपत में कटौती करके उद्योगों को सबसिडी दी जाए। असल मुद्दा है कि सरकार की आय का उपयोग सरकारी कर्मियों को बढ़े हुए वेतन देने के लिए किया जाएगा अथवा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए। इस मूल मुद्दे पर रिजर्व बैंक का तनिक भी दखल नहीं है। वित्त मंत्री को चाहिए कि सरकारी खपत में कटौती तथा निवेश में वृद्धि की पालिसी बनाएं। यह मूल पालिसी सही रहेगी, तो रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता का लाभ ही होगा।
- डा. भरत झुनझुनवाला

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