असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक होली

  • 2016-03-22 12:30:04.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

भारत के प्रमुख त्यौहार होली का सम्बन्ध वैदिक मतानुसार नवान्नेष्टि यज्ञ से माना जाता है ए जिसमें  यज्ञ रूप में नवीन अन्न की बालियाँ भूनी जाती हैए फिर भी होलिकोत्सव का सम्बन्ध अनेक धार्मिक मान्यताओंए मिथकए परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से संयुक्त हैं  और इससे सम्बंधित अनेक पौराणिक कथाएँ भी प्रचलित हैं ।परन्तु प्रत्येक कहानी का अन्त असत्य पर सत्य अर्थात अधर्म पर धर्म की विजय से होती है और अंतत: राक्षसी प्रवृत्तियों का अन्त होता है।अंततरू इस पर्व का उद्देश्य मानवदृकल्याण ही है। भारत की लोकसंगीतए नृत्यए नाट्यए लोककथाओंए किस्सेए कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारोंए मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है। होली के त्यौहार से जुड़ी अनेक पौराणिक गाथाओं में कामदेव एप्रह्लाद एढूण्ढिक़ा और पूतना की कहानियाँ प्रमुख है। होली की प्रथम कहानी शिव और पार्वती से जुड़ी है। हिमालय पुत्री पार्वती की इच्छा थी कि उनका विवाह भगवान शिव से हो जाये परन्तु शिव अपनी तपस्या में लीन थे। इस पर कामदेव पार्वती की सहायता हेतु आगे आये। उन्होंने प्रेम बाण चलाया जिससे शिव की तपस्या भंग हो गयी। इस पर शिव को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी नेत्र  खोल दी। उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। फिर शिव ने पार्वती को देखा। पार्वती की आराधना सफल हुई और शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया । होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

[caption id="attachment_26377" align="alignleft" width="267"]असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक होली असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक होली[/caption]

होली का त्यौहार प्रह्लाद और होलिका की कथा से भी जुड़ा हुआ है । पौराणिक ग्रंथों के अनुसार प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु नास्तिक थे । उसकी इच्छा थी कि उनका पुत्र भगवान नारायण की आराधना छोड़ देए  परन्तु प्रह्लाद इस बात के लिये तैयार नहीं था।  हिरण्यकश्यपु ने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद के साथ आग में बैठने को कहा।  होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगीए परन्तु होलिका का यह वरदान उस समय समाप्त हो गया जब उसने भगवान भक्त प्रह्लाद का वध करने का प्रयत्न किया।  होलिका अग्नि में जल गई परन्तु नारायण की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ । होलिका को यह स्मरण ही नहीं रहा कि अग्नि स्नान वह अकेले ही कर सकती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार होलिकोत्सव हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के मारे जाने की स्मृति में मनाया जाता है।

भविष्योत्तर पुराण में अंकित एक कथा में ए युधिष्ठिर के द्वारा फाल्गुन.पूर्णिमा को प्रत्येक गाँव व नगर में उत्सव मनाये  जानेए प्रत्येक घर में बच्चों के क्रीड़ामय हो जाने और होलाका जलाये जाने का  कारण और तत्सम्बन्धी कथा के बारे में पूछे जाने पर श्रीकृष्ण ने उसमें होने वाले देवता की पूजाए इस उत्सव का प्रचारकर्ता और इसे अडाडा कहे जाने का कारण बतलाने के लिए एक कथा की  सहारा ली है। कथा के अनुसार सतयुग में दैत्यों के कुलगुरू शुक्राचार्य की कन्या जिसका नाम ढूण्ढिक़ा था बहुत ही कामांध थी । यह  कथा थोड़े  बहुत उलट  फेर  के  साथ कई  पुरातन  ग्रंथों  में  आई  है।

ढूण्ढिक़ा को कहीं.कहीं ढोण्ढाए कहीं ढुण्ढा तो कहीं धुंधा भी कहा गया है । ढूण्ढिक़ा की कामवासना इतनी प्रबल थी कि वह हजारों पुरूषों से संबध स्थापित करने के पश्चात भी तृप्त नहीं होती थी । हजारों पुरूषों को उसने अपमानजनक ढंग से यातनाएँ  दी क्योंकि वे उसकी कामतृप्ति न करा सके थे । उसकी इस कामपिपासा को देखते हुए पुरूष उससे भयभीत रहने लगे । काम भावना के वशीभूत उसके कृत्यों से सारा समाज शर्मसार होने लगा । राजा रघु के पास राज्यवासी यह कहने के लिए गये कि राज्य में दैत्यों के कुलगुरू शुक्राचार्य की पुत्री ढूण्ढिक़ा नामक एक राक्षसी है जिसे शिव ने वरदान दिया है कि उसे देवए मानव आदि नहीं मार सकते हैं और न वह अस्त्र . शस्त्र या जाड़ा या गर्मी या वर्षा से मर सकती हैए किन्तु शिव ने उसे इतना कह दिया है कि वह क्रीड़ायुक्त बच्चों से भय खा सकती है । वही ढूण्ढिक़ा राक्षसी बालकों व प्रजा को पीडि़त करने लगी है । अडाडा मंत्र का उच्चारण करने पर वह शांत हो जाती है ए इसीलिए जन उसे अडाडा भी कहते हैं। इस प्रकार भगवान शिव के अभिशाप वश वह ग्रामीण बालकों की शरारतए गालियों व चिल्लाने के आगे विवश हो वह  भागती है । इस पर विद्वान पुरोहितों के निर्देशानुसार होली के दिन ही सभी बालकों ने मिलकर अपनी एकता के बल पर ललकारते हुए आगे बढक़र ढूण्ढिक़ा अर्थात धुंधी को गाँव से बाहर धकेला था। बच्चे ज़ोर.ज़ोर से चिल्लाते हुए चतुराईपूर्वक उसकी ओर आगे बढ़ते ही गये। सभी ने मिल धूम मचाकर उसका ऐसा बहिष्कार किया कि वह हार कर भाग खड़ी हुई और मृत्यु को प्राप्त हो गई । वह दिन फाल्गुन की पूर्णिमा  का दिन था और उस दिन को अडाडा या होलिका कहा गया। इस विजय की याद में होली के  दिन कामपर्व उत्सव के रूप मे मनाने का निर्णय लिया गया । तभी से इस लोकपर्व में अश्लीलता का भी समावेश हो गया । अश्लील गालियों की परंपरा तभी से शुरू मानी जाती है और यही कारण है कि इस दिन नवयुवक कुछ अशिष्ट भाषा में हँसी मजाक कर लेते हैंए परंतु कोई उनकी बातों का बुरा नहीं मानता । विद्वानों के अनुसार सतयुग में भविष्योतर नगर में बालए वृद्ध और नवयुवकों अर्थात सभी नागरिकों को सर्दी.जुकाम जैसी बीमारियाँ लग गई। वहाँ के लोग इसे ढोण्ढा नाम की राक्षसी का प्रभाव मान रहे थे। इससे रक्षा के लिए वे लोग आग के पास रहते थे। सामान्य तौर पर मौसम परिवर्तन के समय लोगों को इस तरह की बीमारियाँ हो जाती हैंए जिसमें अग्नि राहत पहुँचाती है। शामी का पेड़ जिसे अग्नि.शक्ति का प्रतीक माना गया थाए उसे जलाया गया और अगले दिन सतयुग में  राजा रघु ने होली मनायी। होलिका दहन पूर्ण चंद्रमा ;फाल्गुन पूर्णिमाद्ध के दिन ही प्रारंभ होता है।

इस दिन सायंकाल को होली जलाई जाती है। इसके एक माह पूर्व अर्थात् माघ पूर्णिमा को एरंड या गूलर वृक्ष की टहनी को गाँव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता हैए और उस पर लकडिय़ाँए सूखे उपलेए खर.पतवार आदि चारों से एकत्र किया जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा की रात या सायंकाल इसे जलाया जाता है। परम्परा के अनुसार सभी लोग अलाव के चारों ओर एकत्रित होते हैं । पद्मपुराण और वात्स्यायन का कामसूत्र में भी यह कथा वर्णित है। हेमाद्रि व्रत  ग्रन्थ के भाग 2 में भी यह कथा उद्धृत की गई है ।

होलिकोत्सव का सम्बन्ध श्रीकृष्ण से माना जाता है । महाभारत  के  कथा के अनुसार राक्षसी पूतना एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर बालक कृष्ण के पास गयी।  वह उनको अपना जहरीला दूध पिला कर मार देना चाहती थी।  दूध के साथ साथ बालक कृष्ण ने उसके प्राण भी ले लिये।  कहते हैं मृत्यु के पश्चात पूतना का शरीर लुप्त हो गया इसलिये ग्वालों ने उसका पुतला बना कर जला डाला।  पौराणिक कथा के अनुसारएमथुरा तब से होली का प्रमुख केन्द्र है। इतिहासकारों का कहना है कि होली के पर्व का प्रचलनए पहले आर्यों में भी था ए लेकिन इस त्योहार को अधिकतर पूर्वी भारत में ही मनाया जाता है । इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक ग्रन्थों में प्राप्य है । नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रन्थों के साथ ही ईसा से तीन. चार सौ वर्ष पुराने कई अभिलेखों में भी इस पर्व का उल्लेख अंकित है ।
-अशोक प्रवृद्ध

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