असहिष्णुता इसे कहते हैं राहुल जी

  • 2015-12-05 01:30:23.0
  • राकेश कुमार आर्य

rahul gandhiयह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस संसद की कार्यवाही को फिर वैसे ही बाधित कर रही है जैसे उसने विगत सत्र के दौरान किया था। संसद का मूल्यवान समय व्यर्थ ही नष्ट हो रहा है जिससे व्यथित होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2 दिसंबर को लोकसभा से उठकर बाहर चले गये। इस सारी अव्यवस्था का कारण है कांग्रेस की दोहरी मानसिकता, अनीतिपरक नेतृत्व और कांग्रेस में किसी की भी जिम्मेदारी निश्चित न होना। इस समय कांग्रेस के भीतर संसद को लेकर तीन केन्द्र बने हुए हैं-सोनिया, राहुल और खडग़े। जहां ये अड़ेंगे वहीं कांग्रेसी भिड़ेंगे-इस नीति पर कांग्रेस संसद में कार्य करती जान पड़ रही है।

इन तीनों में सोनिया गांधी अपने आपको धीरे-धीरे पीछे हटा रही हंै और राहुल को अपने स्थान पर लाने का प्रयास कर रही हैं। जबकि राहुल अभी तक जिम्मेदारी के साथ कोई भूमिका निभाने के लिए तैयार नही हैं। यही कारण है कि उन्होंने संसद में विनम्र बने मोदी का भी ‘उपहास’ उड़ाने का असंसदीय आचरण किया है। उनके आचरण से नही लगता कि उनके लिए ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ है और उसके लिए वह ‘तीखे मोदी’ को भी सही रास्ते पर लाने की क्षमता रखते हैं, या ‘तीखे मोदी’ के साथ भी अपना पक्ष रखकर सरकार को सकारात्मक सहयोग देने की भावना रखते हैं।

जहां तक खडग़े का प्रश्न है तो खडग़े सरदार मनमोहन से कुछ सीख ले चुके हैं, इसलिए वह संसद में अधिक बोलकर अपना अस्तित्व दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। वह जानते हैं कि अधिक बोलने से ही उन्हें कांग्रेस में कुछ भाव मिलेगा। इसलिए जिम्मेदारी की भावना से वह भी वंचित हंै। यही कारण है कि संसद में फिर निम्नस्तरीय आचरण होता दिखाई दे रहा है। संविधान पर हुई बहस के समय जिस प्रकार स्तरीय चर्चा हुई थी उससे लगा था कि संसद को फिर पटरी पर लाने के लिए राजनीतिक दल कोई ठोस रणनीति तैयार करेंगे। पर ऐसा हुआ नही। जो लोग संसद में सरकार को घेरे रखकर उसे केवल परेशान करते रहने के लिए संसद के मूल्यवान समय को नष्ट कर रहे हैं, वे भी एक प्रकार की असहिष्णुता का ही प्रदर्शन कर रहे हैं। यह कितना हास्यास्पद है कि जिस संसद में अभी ‘असहिष्णुता’  शब्द बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है, वही संसद इस समय उन्हीं लोगों की ‘असहिष्णुता’ का शिकार बनी हुई है, जो इस चर्चा का आरंभ कराने वाले रहे हैं।

देश का विपक्ष भूल गया है कि अडंग़ा डालकर गतिरोध उत्पन्न करना एक बात है और सरकार की नीतियों को राष्ट्रहित में और भी अधिक उपयोगी बनाने के लिए उनकी आलोचना करके उनमें यथावश्यक परिवर्तन या सुधार कराना एक अलग बात है। विपक्ष को दूसरी बात का ही पालन करना चाहिए। मोदी कहीं अहंकारी हो सकते हैं, उनकी वाणी में कहीं व्यंग्य का विष हो सकता है, तो इसका अर्थ यह नही कि विपक्ष उनके अहंकार और वाणी के व्यंग्य के विष को ही कोसता रहे। इसके विपरीत इसका अर्थ है कि विपक्ष मोदी के अहंकार और वाणी के व्यंग्य के विषय की औषधि बन जाए और जब रोगोपचार हो जाए तो राष्ट्रहित में पक्ष और विपक्ष एक साथ मिलकर कार्य करें।

निस्संदेह विपक्ष ने अपना अवसर गंवा दिया है और मोदी ने पक्ष-विपक्ष की बात न करके सबसे निष्पक्ष होकर राष्ट्रहित में कार्य करते रहने की बात कहकर अपने अहंकार और वाणी के व्यंग्य-विष की स्वयं ही औषधि खोज ली है। पर विपक्ष इसके उपरांत भी शांत नही है। यह अतिवादी दृष्टिकोण है जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नही कहा जा सकता।

‘असहिष्णुता’ पर मुखर राहुल गांधी को स्मरण रखना होगा कि उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने जब देश में आपातकाल लगाया था तो लोगों को किस प्रकार के अत्याचारों से दो चार होना पड़ा था? उस समय होशंगाबाद जिला विद्यार्थी परिषद के संगठनमंत्री शम्भू सोन- किया का अनुभव कुछ ऐसा था-‘‘हम कार्यकर्ताओं ने 20 जनवरी 1976 को भोपाल में सत्याग्रह किया। हमें पकडक़र सर्राफा बाजार  पुलिस चौकी ले जाया गया। रात को हमें नंगा कर एक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया। कड़ाके की ठिठुरा देने वाली ठंड और उस पर सीमेंट का फर्श, न ओढऩे को और न बिछाने को, भोजन व पानी का तो प्रश्न ही नही।

सवेरे पुलिस चौकी से हमारे जत्थे के नेता विद्यार्थी परिषद के प्रांतीय मंत्री सुरेश गुप्त को बुलाया गया। थोड़ ही देर में हमें बाजू  के कमरे में सुरेश गुप्त की चीखें सुनाई पडऩे लगीं।

बुरी तरह पिटाई कर उन्हें वापस भेजा गया। वे लड़खड़ाते हुए कोठरी में आये और यह कहते हुए बेहोश हो गये कि
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‘‘बहुत बुरी तरह मारा है राक्षसों ने।’’

उसके बाद मुझे बुलाया गया। पूछा गया-‘केलकर कहां है?’ ‘मैं किसी केलकर को नही जानता।’ यह उत्तर सुनते ही पुलिस की सी.आई. मुझ पर टूट पड़ा। निर्मम पिटाई से अचेत सा हो, मैं फर्श पर गिर पड़ा। इस पर भी उस अधिकारी ने अपने कीलदार जूतों से मुझे ठोकरें मारना जारी रखा। इस यातना के पश्चात भी जब मैंने कुछ न बताया तो मेरे हाथों की अंगुलियों को मोटे रूलों के बीच रखकर जोर से बार-बार दबाया गया। मर्मांतक पीड़ा हो रही थी, मेरी अंगुलियों का भुर्ता बन गया। 5-6 दिन तक वे सीधी भी न हो सकीं। फोड़े की तरह वे तडक़ती थीं।

राहुल जी, इसे कहते हैं ‘असहिष्णुता’। इस प्रकार की ‘असहिष्णुता’ से उपजे अत्याचारों को यह देश आज तक भुला नही पाया है पर फिर भी इस देश का मौलिक संस्कार है कि बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेहि।’ इसी भावना का नाम है वास्तविक पंथनिरपेक्षता और इसी को कहते हैं-वास्तविक सहिष्णुता। विनम्र मोदी के साथ-चार कदम बढ़ाइये, देश अपने नेताओं से कह रहा है-सं गच्छ ध्वं सं वद ध्वं सं वो मनांसि जानताम्-अर्थात तुम्हारी चाल एक जैसी हो तुम्हारी वाणी एक जैसी हो, तुम्हारे मानसिक संकल्प एक जैसे हों, जिन लोगों की अपनी आत्मा मर चुकी है, वे देश की आत्मा की आवाज सुन लें, और देश के लिए संसद की गरिमा और पवित्रता से किसी प्रकार का खिलवाड़ न करें।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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