असहिष्णुता और समान नागरिक संहिता

  • 2016-01-08 04:51:15.0
  • राकेश कुमार आर्य

बड़े गर्व से हम कह सकते हैं कि हमारा भारत महान है, आज इस महान भारत की महान सांस्कृतिक परंपराओं को कलंकित करते हुए कुछ लोगों ने इस देश को ‘असहिष्णु’ कहना आरंभ कर दिया है तो उनके इस देशद्रोही कृत्य को देखकर बड़ा दु:ख होता है। जबकि यह देश तो वह देश है जिसने एक से बढक़र एक विदेशी मुस्लिम आक्रांता को या उनके पश्चात व्यापारी के रूप में लुटेरे बनकर आये अंग्रेजों से अपनी स्वतंत्रता की चाहे जितनी लंबी लड़ाई लड़ी हो, और चाहे उनसे जितना लंबा वैर रखा हो, पर उनकी साम्प्रदायिक मान्यताओं को मिटाकर उनसे साम्प्रदायिक घृणा नही पाली। भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा के लिए अपना संघर्ष करके भी दूसरे लोगों के सामाजिक जीवन में या व्यक्तिगत जीवन में कभी किसी प्रकार का हस्तक्षेप नही किया। भारत के इतिहास का यह एक विलक्षण तथ्य है कि जिनसे राजनीति शत्रुता थी उन्हें सामाजिक स्तर पर अपने साथ भारत समन्वित करके चलता रहा। है मेरे भारत जैसा महान-कोई और देश इस भूमंडल पर? कलम के साथ-साथ कलाम बेच देने वाले गद्दार इतिहास लेखकों ने भारतीय इतिहास के इस विलक्षण तथ्य को इतिहास में कहीं स्थान नही दिया है।

अपनी इसी विलक्षण इतिहास परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भारत ने स्वतंत्रता के पश्चात उन लोगों को भी अपने साथ समन्वित कर लिया जिन्होंने आजादी से पूर्व हुए चुनावों में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए अपना मत मुस्लिम लीग को दिया था और इस देश का बंटवारा साम्प्रदायिक आधार पर कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। देश के स्वतंत्र हो जाने पर इन लोगों को भारत ने अपने सर्व समन्वयी समाज में सम्मानपूर्ण ढंग से जीने का अधिकार दिया। फलस्वरूप जो लोग 1947 में मात्र ढाई करोड़ थे वे 2011 की जनगणना में बीस करोड़ हो गये। सहिष्णुता का इससे सुंदर उदाहरण और कहां मिलेगा? जबकि पाकिस्तान में 1947 में जितने हिंदू थे (वह भी लगभग ढाई करोड़ ही थे) वह घटकर आज केवल बीस लाख रह गये हैं। असहिष्णुता की इससे घटिया कोई मिसाल नही हो सकती। भारत में जिन मुस्लिम विद्वानों ने इस तथ्य को जांचा-परखा है, समझा और जाना है-वे हमारे कथन से शत-प्रतिशत सहमत होंगे। इसके उपरांत भी असहिष्णुता का ठप्पा भारत पर लगाना मूर्खता है।

भारत में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकवाद की बड़ी चर्चाएं होती हैं। इन्हें लोगों की साम्प्रदायिक आधार पर गिनती करके देखा जाता है। जो लोग साम्प्रदायिक आधार पर कम हैं, उन्हें अल्पसंख्यक माना जाता है और जो इस आधार पर अधिक संख्या में हैं उन्हें बहुसंख्यक माना जाता है। जबकि यह धारणा भी केवल राजनीतिक आधार पर लाभ लेने के लिए राजनीतिज्ञों की सोच का परिणाम है।

हम तनिक पुन: इतिहास की ओर चलें। स्वतंत्रता से पूर्व जब इस देश पर अंग्रेज शासन कर रहे थे तो वह संख्या में मुट्ठी भर (कुछ लाख) ही थे। परंतु उन्होंने देश पर शासन किया और सारे अधिकार अपने हाथ में रखे। इसी प्रकार कभी आगरा से तो कभी दिल्ली से मुस्लिम सुल्तान या बादशाह भी देश के कुछ भाग पर (कभी अधिक पर तो कभी कम पर) शासन करते रहे उनकी संख्या भी (साम्प्रदायिक आधार पर) अति न्यून ही रही, पर जब तक उनका शासन रहा, तब तक उन्होंने स्वयं को अल्पसंख्यक नही समझा। इस विषय पर एम.जे.अकबर का मत सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वह कहते हैं कि अंग्रेज राज के भीतर भी शक्तिशाली मुस्लिम रियासतें और हुकूमतें थीं जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैदराबाद की रियासत थी, जिसकी नींव मुगलों के एक निजामुलमुल्क ने 1725 ई. में रखी थी। यह राजवंश 1948 तक बरकरार रहा। जिसके सातवें और आखिरी निजाम मीर उस्मान अपनी कंजूसी के लिए और दुनिया में हीरों के सबसे बेशकीमती खजाने के लिए प्रसिद्घ हुए। वे टीन की तश्तरी में खाना खाते थे, मेहमानों के छोड़े गये सिगरेट के ठुंठ पीते थे, और वायसराय लॉर्ड वेवल जैसे प्रमुख अतिथि को गहरी हिचकिचाहट के बाद शैम्पेन पेश करने के लिए सहमत हुए थे। मगर 280 कैरेट के जैकब हीरे को पेपर वेट के रूप में प्रयोग करते थे। उनकी रियासत के दो करोड़ तीस लाख लोगों में सिर्फ तीस लाख मुसलमान थे, मगर जब तक उनका शासक मुसलमान था तब तक क्या मुसलमान खुद को अल्पसंख्यक समझते थे? नही।

इसलिए श्री अकबर कहते हैं कि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक होना गिनतियों की कारगुजारी से अधिक शक्ति संतुलन का शक्ति के पैमाने का मसला है। शहंशाहों नवाबों और निजामों के जेरे साया मुसलमानों के लिए ताकत ऐसी पक्षधरता में रूपांतरित होती थी जो उनके लिए नौकरशाही, कानून और फौज में रोजगार हासिल करना आसान बनाती थी।

जब अंग्रेजों की सत्ता आयी तो उन्होंने भी अपनी शक्ति का दुरूपयोग सत्ता और साम्प्रदाय के नाम पर किया। उनके समय में ईसाईयों को वे सारी सुविधाएं पक्षपात के आधार पर स्वाभाविक रूप से मिल गयीं जो उनसे पूर्व मुस्लिमों को उपलब्ध हुआ करती थीं।

जब देश आजाद हुआ तो देश के संविधान निर्माताओं ने देश में पंथनिरपेक्ष शासन की स्थापना की। जिसका उद्देश्य केवल यह था कि अब देश के निवासियों के मध्य शासन साम्प्रदायिक आधार पर कोई भेदभाव नही करेगा। अब सबको अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के सभी अवसर उपलब्ध होंगे। इसीलिए सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक परिवेश को देश में शुद्घ और सात्विक बनाकर पक्षपात शून्य करने की संकल्पना को साकार करने के उद्देश्य से समान नागरिक संहिता को लागू करने की व्यवस्था संविधान में की गयी। संविधान निर्माताओं ने यदि कहीं संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का प्रयोग कर भी दिया है तो उसका यही अर्थ है। वास्तव में अल्पसंख्यकों को कोई बहुसंख्यक अपने प्रतिरोध, विरोध या प्रतिशोध का ग्रास ना बनायें इसीलिए समान नागरिक संहिता को संविधान में स्थान दिया गया। कहने का अभिप्राय है कि समान नागरिक संहिता किसी बहुसंख्यक को अतिरेकी बनने से-असहिष्णु बनने से रोकने की संवैधानिक प्रतिभूति है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सुरक्षा कवच है, लोकतंत्र का एक सार्वभौम मूल्य है और एक प्रगतिशील देश या समाज की प्रगतिशीलता का सबसे उचित माध्यम है। परंतु इसके उपरांत भी भारत का बहुसंख्यक अपनी सहिष्णुता का प्रदर्शन करते हुए इस समान नागरिक संहिता को लागू कराने की मांग एक पक्षीय ढंग से करता है। दूसरी ओर से इसके समर्थन में हाथ आशा के अनुरूप नही उठते। जिन लोगों ने देश में असहिष्णुता की कल्पना की है और उसके आधार पर अपनी उपाधियां लौटाईं उन्हें अल्पसंख्यकों के प्रति बहुसंख्यकों का व्यवहार पंथनिरपेक्ष रहे (जो रहता भी है) इसके लिए देश में समान नागरिक संहिता को लागू कराने का आंदोलन चलाना चाहिए था और यदि मोदी सरकार उनकी मांग नही मानती तो उसके विरोध में अपनी उपाधियां लौटानी चाहिए थीं।

राकेश कुमार आर्य ( 1581 )

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