महामहोपाध्याय आर्यमुनि और उनका प्रमाणिक वैदिक साहित्य - 2

  • 2016-04-29 13:30:28.0
  • मनमोहन सिंह आर्य

-मनमोहन सिंह आर्य

गतांक से आगे.....

आप मरे न टरे सत पन्थ से, दीनन का जिन दु:ख निवारा।
उन आन उद्धार किया हमरा, जो गिरें अब भी तो नहीं कोई चारा।
ऐसे ऋषिवर को सज्जनों, कर जोड़ दोऊ अब बंद हमारा।।8।।

हमने मूर्धन्य आर्य विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय जी के ग्रन्थ आर्यलेखक कोश व पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी द्वारा सन् 1977 में 39 वर्ष पूर्व प्रकाशित आर्यमन्तव्य-प्रकाश-द्वितीय-भाग से इस लेख को तैयार करने में सहायता ली है। उनका हार्दिक धन्यवाद एवं आभार है। पण्डित आर्यमुनि जी का जन्म सन् 1862 में हुआ था और महषि दयानन्द जी की मृत्यु 30 अक्तूबर, सन् 1883 को अजमेर में हुई। सन् 1883 में पण्डित जी 21 वर्ष के युवक थे। हमारा अनुमान है कि आपने पंजाब व काशी में से किसी स्थान पर महर्षि दयानन्द के दर्शन अवश्य किये होंगे। हो सकता है कि स्वामीजी के उपदेश भी सुने हों वा उनसे वार्तालाप भी किया हो। पण्डित जी के अधिंकाश ग्रन्थ सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं। आर्यसमाज में ऐसी कोई सभा, संस्था व स्थान नहीं है जो अपने पूर्वजों के महत्वूपर्ण अनुपलब्ध ग्रन्थों की सुरक्षा पर ध्यान देता हो वा उन्हें प्रकाशित करने का प्रयास करता हो। हां, छुटपुट प्रयास, कुछ व्यक्तिगत व कुछ संस्थाओं व प्रकाशक स्तर पर, यत्र-तत्र व यदा-कदा हो जाते हैं परन्तु एक बहुयामी प्रकाशन नीति की आवश्यकता है। वर्तमान की स्थिति दु:खद व हानिप्रद है और एक प्रकार का अपने पूर्वजों के प्रति कृतघ्नता का पाप भी है। इसका भविष्य में दुष्परिणाम भी हो सकता है।

हमें इस बात की प्रसन्नता है कि पं. आर्यमुनि जी के संक्षिप्त जीवन परिचय व उनके उपर्युक्त भाव प्रधान पद्य से हम भी लाभान्वित हुए हैं और पाठक भी लाभान्वित होंगे। अपने विद्वान पूर्वजों को स्मरण करने के कर्तव्यपूर्ति के पालन से भी हमें प्रसन्नता है। हम आशा करते हैं पाठक इस रचना को भी पसन्द करेंगे।

‘आत्मा का स्वराज्य’

डा. रामनाथ वेदालंकार जी वेदों के प्रसिद्ध विद्वान थे। अनेक विद्वानों के श्रीमुख से  हमने उनके लिए वेदमूर्ति सम्बोधन द्वारा उनका यशोगान भी सुना है। उनकी मृत्यु पर मूर्धन्य विद्वानों ने विवेचना पूर्वक उन्हें मोक्षपद का उत्तराधिकारी भी कहा था। हमारा सौभाग्य है कि हमें उनके साथ जीवन का कुछ समय व्यतीत करने का अवसर मिला और हमने उन्हें बहुत निकट से देखा है। अनेक विषयों पर उनसे चर्चायें कीं और उनसे समाधान प्राप्त किये। वैदिक विद्वान डा. रामनाथ वेदालंकार जी ने विस्तृत संस्कृत-हिन्दी सामवेद भाष्य सहित वेदों पर अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया जो वेद पिपासुओं के लिए अमृत के समान हैं। ‘वेद मंजरी’ उनकी एक प्रसि़द्ध कृति है जिसमें उन्होंने चार वेदों से चुनकर 365 वेद मन्त्रों की आनन्दरस से युक्त मन व आत्मा को झंकृत करने वाली व्याख्यायें की है। हमने उनके प्राय: सभी ग्रन्थों को पढक़र उस अमृत रस का पान किया है जिसे उन्होंने अपने जीवन भर की तपस्या से प्राप्त कर वेद प्रेमियों को अपने ग्रन्थों के माध्यम से वितरित किया है। आज हम इस लेख में वेद मंजरी से ऋग्वेद के 2.8.5 मन्त्र की भावूपर्ण ज्ञानवर्धक व्याख्या को प्रस्तुत कर रहे हैं। यह मन्त्र है:

अत्रिमनु स्वराज्यम्, अग्निमुक्थानि वावृधु:। विश्वा अधि श्रियो दधे।।

‘इस मन्त्र का ऋषि मृत्समद:, देवता अग्नि: तथा छन्द निचृद् गायत्री है। मन्त्र का पदार्थ है: (स्वराज्यम् अनु) स्वराज्य के पश्चात् (अत्रिम् अग्निम्) त्रिविध सन्तापों एवं त्रिविध दोषों से रहित आत्मा को (उक्थानि) स्तुति गीत (वावृधु:) बढ़ाते हैं। (वह आत्मा) (विश्वा) समस्त (श्रिय:) शोभाओं को (अधि दधे) धारण कर लेता है।

वेदों के मर्मज्ञ विद्वान आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी ने इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ‘कर्मफल भोगने तथा नवीन कार्य करने के लिए शरीर में आया हुआ मनुष्य का जीवात्मा बहुत बार त्रिविध दु:खों से संतप्त होता रहता है।

ये त्रिविध दु:ख हैं--आध्यात्मिक दु:ख, आधिभौतिक दु:ख, आधिदैविक दु:ख। दु:ख तो तीनों ही मन द्वारा आत्मा को अनुभव होते हैं, पर दु:खों का कारण त्रिविध होने से दु:ख त्रिविध कहे गये हैं। आध्यात्मिक दु:ख किसी मनोवांछित दिव्य पदार्थ प्राप्त न होने के कारण, अध्यात्म-साधना के विफल होने के कारण या आत्मा, मन, बुद्धि आदि के सदोष हो जाने के कारण अनुभूत होते हैं। आधिभौतिक दु:ख शरीर एवं इन्द्रियों के रूग्ण, अशक्त आदि हो जाने के कारण होते हैं। आधिदैविक दु:ख अतिवृष्टि, अनावृष्टि, विद्युत्पात, दुर्भिक्ष, भूकम्प आदि दैवी उपद्रवों के कारण होते हैं। आत्मिक, वाचिक और शारीरिक दोष अथवा आत्मा, मन एवं शरीर के दु:ख भी त्रिविध सन्ताप कहलाते हैं। ये सब त्रिविध दु:ख सन्ताप या दोष जिस आत्मा में नहीं रहते वह आत्मा ‘अ-त्रि’ कहलाता है। वह ‘अ-त्रि’ ही आत्म-स्वराज्य का अधिकारी होता है। अन्यथा जब तक मनुष्य का आत्मा त्रिविध दु:खों या दोषों से संतप्त रहता है, तब तक वह अपने शरीर मन, प्राण, इन्द्रिय आदि प्रजाओं का सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र अधीश्वर नहीं कहला सकता। ‘अत्रि’ होकर आत्मा जब स्वराज्य प्राप्त कर लेता है, अपनी इच्छानुसार मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय, शरीर आदि को संचालित करने लगता है, तब ‘उक्थ’ अर्थात् मन, इन्द्रियों आदि द्वारा किये जानेवाले स्तुति गीत उसे बढ़ाने लगते हैं, समृद्ध और महिमान्वित करने लगते हैं। इस स्वराज्य के पश्चात् आत्मा समस्त श्रियों को, शोभाओं को, धारण कर लेता है। राष्ट्र में एक सम्राट की जो स्थिति होती है, वह शरीर में उसकी हो जाती है। जैसे स्वराज्य-काल में राष्ट्र में एक सम्राट् की जो स्थिति होती है, वह शरीर में उसकी हो जाती है। जैसे स्वराज्य-काल में राष्ट्र की समस्त गतिविधियां उसके सम्राट् के अधीन होती है, कोई उसके साथ विद्रोह नहीं कर सकता, वह सर्वविध शोभाओं से सम्पन्न होता है, वैसे ही स्वराज्यावस्था में आत्मा भी श्री-सम्पन्न, दैवी-सम्पदाओं से युक्त तथा दुष्प्रवृत्तियों के उपद्रवों से विहीन हो जाता है। आओ, हम भी आत्मा को ‘अत्रि’ बनायें, स्वराज्य का आराधक बनायें, स्तुतियों का पात्र बनायें और अन्तत: उसे समस्त आध्यात्मिक शोभाओं एवं गरिमाओं से अलंकृत कर लें।’
वेदों का स्वाध्याय करने से मनुष्य का आत्मा वेदों के कर्ता ईश्वर व वेद के व्याख्याकार की आत्मा से जुड़ जाता है और इस स्वाध्याय से उसके गुणों में वृद्धि व अवगुणों का नाश होता है। वेदों के स्वाध्याय से वर्तमान जीवन उन्नति को प्राप्त होता है साथ हि परजन्म भी सुधरता है। वेदों के स्वाध्याय के अनेक लाभ हैं, हानि कुछ भी नही।

अत: सबको वेदों का स्वाध्याय कर ईश्वर और अपने पूर्वज ऋषियों की आज्ञा ‘स्वाध्यायान् मा प्रमद:’ का पालन कर निश्चिन्त होना चाहिये। इसी के साथ हम डा. रामनाथ वेदालंकार जी की उक्त वेदमन्त्र व्याख्या पाठकों को सादर भेंट करते हैं।