आर्य भारत में कहां से आए ?

  • 2015-12-08 14:05:07.0
  • राहुल खटे

Aryansकल लोकसभा में असहिष्णुता के मुद्दे पर चर्चा हो रही थी, जिसमें एक सांसद ने कहा था कि ‘भारत में आर्य बाहर से आए हैं’। सवाल यह उठता है कि इस बात में कितना तथ्य हैं और आजादी के इतने वर्षों के बाद भारत में इतिहास में शोध करने वालों को आज तक इस बात का पता क्यों नहीं चला कि भारत में आर्य कब आए। ‘दी डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत एक खोज)’ में लिखा है कि ‘भारत में आर्य उत्तरी धृव से आए, लेकिन उन्होंने यह बताने कष्ट नहीं किया कि आर्य भारत में कब आए।

जिस देश का नाम ही ‘आर्यावत्र्त’ हो, उस देश में भारत बाहर से आए और इस बात का सभी बुद्धिजीवियों द्वारा समर्थन करना कितनी बड़ी बौद्धीक दरिद्रता का प्रतीक है। दरिद्रता हो भी क्यों नहीं, क्योंकि यही तो वह (अंग्रेज) चाहते थें कि हम अपना वास्तविक इतिहास भुल जाए। हम हमारे ही देश में बेगाने बन कर रह जाए। मैकॉले महाशय जहां-कही भी होगे, इस बात पर जश्न अवश्य मना रहें होगे। अब थोडा आर्य’ शब्द के अर्थ पर गौर करते हैं, ‘आर्य’ शब्द का जो अर्थ शब्दकोशों में दिया गया है, इससे यह पता चलता है, कि वह किन लोगों के लिए प्रयोग में लाया जाता हैं, लेकिन इस बात का पता नहीं चलता कि उसकी उत्पत्ति कैसे हुई। कहते हैं किसी शब्द की वास्तविकता की खोज़ करनी हो तो, उस शब्द की उत्पत्ति पर ध्यान देना चाहिए। इतिहास के वास्तविक अनुसंधानकर्ता श्री नरेंद्र पिपलानी के अनुसार आर्य शब्द ‘अर’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘आधा’ होता है। अब यह आधा क्या हैं आपने देखा होगा कि, सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और पश्चिम में अस्त होता है, पूर्व से उदय होकर पश्चिम में अस्त होने तक वह आधा चक्र पूरा करता है, इसलिए हम उसे पूरा नहीं देख पाते हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर आधे दिखाने देने वाले सूर्य की आराधना करने वाले लोग को ‘आर्य’ नाम दिया है, क्योंकि वह सूर्य के उपासक थे, यह सर्वविदित हैं। अब यह धारणा कि, भारत में आर्य बाहर से आए जानबूझकर कुछ अंग्रेज विद्वानों ने फैलाई थी। यह धारणा इस देश में फैलाने के पीछे उनकी इस देश के वास्तविक भूमीपूत्रों को भ्रम में डाल कर उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई से अपना ध्यान दूसरी तरफ मोडऩा था, ताकि वे इस भारत भूमी पर अपना अधिकार न बता सकें। आर्य एकमेव ऐसी प्रजाति है, जिसके पूर्वज  केवल भारत में ही पाए जाते हैं। आपने देखा होगा कि जब किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की जमीन पर अपना कब्जा करना होता है, तो वह यह साबीत करने की कोशिश करता हैं कि यह भूमी तुम्हारी नहीं है। उसके वास्तविक मालिक को भ्रम में डाल दिया जाए और ऐसी स्थिति उत्पन्न की जाए कि, वास्तविक मालिक भी चक्कर में पड़ जाए। आपने देखा होगा कि कुछ लोग प्लॉट के नक्शे में किस प्रकार छेड़छाड करते हैं। आधी फीट जमीन हथियाने के कई सारे मामले देश की न्यायालयों के पास लंबीत पड़े हैं। जिस प्रकार पाकिस्तान कश्मीर पर अपना हक जमाने के लिए किस प्रकार की तिकडमबाजी करने में दिन रात लगा रहता है। पाकिस्तान ‘ऑक्यूपाइड कश्मीर (पीओके)’ शब्द आपने कई बार सुना होगा, इसका सरल शब्दों में अर्थ जो जमीन उसकी नहीं है उसको हथियाने की नाकाम कोशिश करना है, जिसे हम ‘अतिक्रमण’ कहते हैं और अतिक्रमण का अंत क्या होता है, यह भी आप भलिभॉति जानते हैं!

‘आर्य भारत में बाहर से आए’ यह दिखाने के लिए अंग्रेजों ने जानबूझकर यह भ्रम इस देश के बुद्धिजीवियों में फैलाया ताकि यह जन-जन तक पहॅुच जाए। क्योंकि हमारे देश के कुछ विदेशी डीग्रीधारी तथाकथित बुद्धिजीवि यह कार्य मुफ्त में ही कर देंगे, यह अंग्रेजों को अच्छी प्रकार से पता था।

एक भी भारतीय यह  स्वीकार नहीं कर सकता कि, उसके पूर्वज भारत में कही बाहर से आए हो। यदि हमारे वेद, पुराण, उपनिषद और शास्त्रों का गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है, भारत की प्राचीन भाषाओं से विश्व की सभी भाषाओं में शब्द गए है। इसीलिए संस्कृत भाषा के शब्दकोश में सर्वाधिक शब्द पाए जाते हैं, दुनिया की किसी भाषा में इतने शब्द नहीं पाए जाते हैं, क्योंकि संस्कृत से ही यह शब्द अन्य देशों की भाषाओं में गए है। शब्द दुसरे देशों में उडक़र तो जा नहीं सकते किसी व्यक्ति या परिवार के माध्यम से ही यह शब्द गए होगे। हमारे पूर्वज समुद्र के मार्ग से और नेपाल, पाकिस्तान और अन्य युरोपीय देशों में व्यापार करने के लिए प्राचीन काल से जाते रहें हैं, जिस प्रकार आज कोई व्यक्ति अमेरिका नौकरी या व्यापार करने के लिए जाता है, तो अपने साथ कुछ जीवनावश्यक वस्तुं, परिवार के कुछ सदस्यों और धर्मग्रंथों को लेकर जाते थें, यह सभी व्यक्ति की भाषा के संवाहक हैं। इसीलिए ग्रीक, लैटीन, जर्मन और अन्य भाषाओं में भी पाए जाने वाले शब्द बिलकुल हमारी प्राचीन भाषा संस्कृत में पाए जाते हैं, क्योंकि वह संस्कृत से ही उन भाषाओं में गये हैं, इसीलिए ऑक्सफोर्ड की डिक्शनरी में भी जीन शब्दों की उत्पत्ति नहीं दी गई हैं, ऐसे कई सारे शब्दों की उत्पत्ति संस्कृत के शब्दों को मिलाकर देखने से मिल जाती है, जैसे अंग्रेजी की ‘Full’ शब्द की उत्पत्ति ‘प्रफुल्ल’ शब्द से हुई, इसे कोई झुठला नहीं सकता, क्योकि स्नह्वद्यद्य शब्द में डबल एल कहा से आया इस शब्द के उच्चारण में डबल एल का कोई उच्चारण नहीं होता है, मात्र एक ही एल का उच्चारण होता है, अंग्रेजों (विदेशियों) ने ‘प्रफुल्ल’ शब्द का फूल उच्चारण तो कर दिया लेकिन डबल एल क्यों है, वह नहीं बता सकते। इसी प्रकार अंग्रेजी की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में कई शब्दों की व्युत्पत्ति Unknown अर्थात ‘अज्ञात’ दी जाती है, क्योंकि उन्हें ही पता नही कि वह शब्द कैसे बना।

ऐसे कई शब्दों को बताया जा सकता है, जो पश्चिमी देशों में प्रचलन में कहा से आए हैं किसी को पता नहीं। यह तो बात हो गई शब्दविज्ञान की जो भाषा विज्ञान का ही एक अंग है। अब बात करते हैं, डीएनए की। डिएनए  विशेषज्ञों ने भी यह माना है कि, पूरे विश्व के लोगों के डीएनए सैम्पल एकत्रीत किए जाए तो उनके सात-आठ प्रकार ही पाए जाऐंगे, इससे अधिक नहीं क्योंकि हमारी प्राचीन धारणा कि सप्त ऋषियों से मानवों के परिवारों के हम वंशज हैं, ‘गोत्र प्रणाली’ इस धारणा को सिद्ध करती हैं। प्राचीन काल से ही भारत से लोग ज्ञानप्रसार, व्यापार और अन्य कारणों से बाहर जाते रहतें हैं। भारत से लोग बाहरी देशों में जाकर बसते हैं, न कि बाहर से भारत में आकर बस गए।

अब, भौगोलिक दृष्टीकोण से देखते हैं, कि यह धारणा कहा तक सही बैठती है। आज सात खंडों में पृथ्वी की पूरी जमीन को विभाजित किया गया है। इन सप्तद्वीप और नवखंडों का वर्णन प्राचीन साहित्य में भी आता है। क्योंकि यही बाद में कॉन्टीनेंट में परिवर्तित हो गए।

क्रमश: