आर्य भारत में कहां से आए-भाग-2

  • 2015-12-09 03:30:27.0
  • राहुल खटे

india mapभूगोल के अध्ययन से पता चलता है, कि पूरी धरती पर जितने मनुष्य आज पाए जाते हैं, इनका मूल पुरूष अवश्य ही कोई एक ही व्यक्ति रहा होगा, क्योंकि हम वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात करते है, इसका मतलब थोडा गहराई से सोचने से पता चलेगा कि पूरी वसुंधरा(पृथ्वी एक कुटुंब यानी परिवार हैं, इसका मतलब यह है कि पूरी दुनिया एक परिवार ही है। जिस प्रकार एक संख्या से ही दुनिया की बड़ी से बड़ी संख्या बनती हैं, उसी प्रकार यह कुटुंब भी विस्तारित हो कर आज पूरी दुनिया में फैल गया।

भारतीय पुराणों में भगवान महादेव को ‘आदिनाथ’ कहा जाता है और उनका जो भी वर्णन पुराणों में किया गया है वह सारा का सारा दृश्य आपको आज भी हिमालय में देखने को मिल सकता है। महादेव और पार्वती का जो वर्णन पुराणों में दिया गया है, वह सारा का सारा वर्णन आदिम अवस्था के मानव का है, जो आज से लाखों वर्षेां पहले का है। आधुनिक जीवशास्त्र वैज्ञानिक मानते हैं, कोई एक स्त्री-पुरूष से इस पूरी धरती के मनुष्य उत्पन्न हुए है। बाद में विस्तार हो कर यही लोग पूरी धरती पर फैल गए। महादेव का बर्फिली गुफाओं में रहना, व्याघ्रांबर पहनना, नंदी-भृंगी जैसे जीवों के साथ एकांत में रहना, पार्वती के पिता का ‘हिमालयराज’ कहलाना, पार्वती शब्द में पर्वतों की झलक दिखाई देना यह सब कुछ आदिम अवस्था के मानव ही वर्णन है पाश्चात्य संशोधको ने हमें बताया लेकिन हमारे पूर्वज स्वयं महादेव शिव शंकर है और वहीं हमारे देवों के देव महादेव है, यह तो हमारे देश के अनपढ लोग भी जानते है। बाद में यही हिमालय वासी मध्य और दक्षिण दिशाओं में फैल गए और द्रविड कहजाए। इसलिए द्रविड और आर्यों के बीच में वैमनस्य को बढाकर उन्हें यह बताना कि आर्य बाहर से आए ऐसी  सस्ती मुर्खता का प्रसार अंग्रेजों और पश्चिम के विद्वानों ने शुरू किया। उनमें से कुछ पूर्वज हिमालय को पार करते हुए ही हमारे पूर्वज युरोपीय देश में फैले हुए है। इस प्रकार भारत में उत्पन्न लोग ही पूरे विश्व में जाकर बस गए। इसीलिए आपने देखा होगा कि, दुनिया के किसी देश के व्यक्ति का मूल पुरूष भारत से आया ऐसी लगभग सभी देशों में धारणा है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में जिन देशों के नाम आते है, वहीं देश आज भी मौजुद है। उनके नामों में थोड़ा-बहुत अंतर आ गया है। अमेरिका को यदि मैं ‘अ-मय-रिका’ लिखुँ तो यह मय राजा की नगरी कही जा सकती है। युरोपीय देशों के साथ भी ऐसा ही कुछ साम्यता दिखाई देती है, और विश्व के प्राचीन देशों के देवों की मुर्तियों में वही देवता है, जिनकी पूजा हम भारत में आज भी करते है। शिव, पार्वती, गणेश यह वह देव है, जो दुनिया के सभी धर्मों में आज भी पूजे जाते है, बस उनके नाम और आकार-प्रकार बदल दिए गए हैं। कई धर्म जो अपने आप को निर्गुणवादी कहलाते हैं, वह भी शिवलिंग की ही पूजा करते हैं। बस उसका नाम बदल दिया गया हैं। क्योकि मुर्तिपूजा करने वाले और मुर्तिपूजा न करने वाले ऐसे दो ही धर्म पूरे विश्व मे पाए जाते हैं, जो मूर्तिपूजा नहीं करते हैं, वह भी अप्रत्यक्षरूप से शिवलिंग की ही पूजा करते हैं। पूरी दुनिया में सूर्य को पूजने वाले और चंद्र को पूजने वाले ऐसे दो ही धर्म पाए जाते हैं। मुझे यदि पूरे विश्व के धर्मों के दो भाग करने हो तो उन्हें सीधे सूर्य के उपासक और चंद्र के उपासक इन दो भागों में किया जा सकता है।

धर्म अलग है, इसका मतलब यहीं होता कि उनका भगवान अलग है, जिस प्रकार देश की कोई भी पार्टी मात्र एक विचारधारा है, दोनों का उद्येश्य सत्ताप्राप्ति की दौड लडऩा और सत्ता प्राप्त करना होता है, उसी प्रकार दुनिया के सभी धर्मों जिनको विचारधारा कहना सही होगा, एक ही उद्देश्य की प्राप्ति की लिए दौड़ रहें हैं।

भगवान अलग होता तो उनको बनाने वाला हिंदुओं को चार हाथ देता क्योंकि हिंदु देवताओं के तो चार हाथ आपने देखें होगे, उनके चार हाथ उनका अधिक सामर्थ्यवान होना बताते है न कि उनके वास्तविक चार हाथ होते हैं, जैसे हमें रामानंद सागरजी ने या फिर किसी चित्रकार या मूर्ति में दिखाए गए हो। देवों के अधिक हाथ होना उनके अधिक शक्ति होने को दिखाते हैं। क्योकि यदि हिंदुओं को बनाने वाला भगवान और मुस्लिमों का अल्लाह दोनों अलग होते तो, हिंदुओं के घर में जन्म लेने वाले बच्चों को दो हाथ मुफ्त में मिले हुए ‘गॉडगीफ्टेट’ होते। मुस्लिमों को बनाने वाला भगवान यदि अलग होता तो मुस्लिमों के बच्चों की शरीर रचना अलग होती, लेकिन ऐसा नहीं है, किसी भी समझदार व्यक्ति को यह इशारा काफी हैं। खुन का रंग एक होने की बात हमें नाना पाटेकरजी ‘क्रांतिवीर’ में बता ही चुके हैं, इसलिए उसे नहीं दोहराउूंगा।

खैर, हम चर्चा कर रहे थें, आर्य भारत में कहां से आए इस विषय की सही जानकारी प्राप्त करनी हो तो आप किसी भी ‘आर्य’ कुलनाम सरनेम के व्यक्ति को यह अवश्य पूँछें कि आपके पूर्वज कहां से आए  हो सकता है कि आपके इस सवाल से वह ‘आर्यमान’ खफ़ा होकर क्रोध करें। तो घबराए नहीं। उस व्यक्ति को आराम से पुँछे कि क्या आपके दादा-परदादा ने आपको यह बताया था कि वह भारत में कहॉं से आए। तो जो जवाब आपको मिलेगा उससे आपका यह भ्रम अवश्य दूर हो जाएगा और आपके ज्ञान के चक्षु अवश्य खुल जाऐंगे। अब यह सिद्ध हो जाए कि भारत में आर्य कही बाहर से नहीं आए हैं तो हम हमारे इतिहास की उन तमाम पुस्तकों का क्या करें, जिन्हें हमने पैसे देकर खरीदा हैं और हमें उन पुस्तकों को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढक़र डिग्रीयां मिली हैं।

लगता है कि मैंकाले का वह सपना जो उसने ब्रिटीश संसद में देखा था कि, हमें भारत को ऐसी शिक्षा पद्धति देनी होगी, जिससे कि भारतीय केवल शरीर से भारतीय रहें और मन, विचार और आत्मा से पूरी तरह अंग्रेज हो जाए यह सपना साकार होता दिख रहा है। किसी ने कहा है कि वह राष्ट्र अपने भविष्य निर्माण नहीं कर सकता हो अपना इतिहास भुल जाता है, इसीलिए अंग्रेजों ने हमारे इतिहास को इस कदर बदल दिया कि, भारतीय अपने ही घर में बेगाने हो गए।