अपने वैज्ञानिकों पर भारत को गर्व है

  • 2016-04-30 03:59:27.0
  • राकेश कुमार आर्य

ISRO_satellites नेवीगेशन सेटेलाइट

1965 के भारत-पाक युद्घ के समय भारत का नेतृत्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में था। उस समय देश में अन्न का भी संकट था। स्वाभिमानी प्रधानमंत्री श्री शास्त्रीजी ने देश के आत्म सम्मान को किसी बड़ी शक्ति के सामने गिरवी न रखकर देश को सफलतापूर्वक अन्न संकट और सैन्य संकट (पाकिस्तान की ओर से किये गये युद्घ) से उबारा तब किसान के पास अन्न नही था और हमारे सैनिकों के पास पर्याप्त हथियार नही थे। पर यह शास्त्रीजी की ही सूझबूझ थी कि उन्होंने देश को संकट से बाहर निकाल लिया। इस संकट से देश को उबारने के लिए उन्होंने जय जवान, जय किसान का नारा लगाया था। सारा देश अपने छोटे कद के प्रधानमंत्री के बड़े फैसलों को देखकर गर्व से झूम उठा था।

1998 में अटलजी ने परमाणु परीक्षण कराया। उस परमाणु परीक्षण की सारी योजना को बड़ा गोपनीय रखा गया था। जब भारत ने सफलता से अपना कार्य कर लिया तो सारा विश्व दंग रह गया था। तब हमारे प्रधानमंत्री ने जय जवान-जय किसान के साथ जय विज्ञान भी जोड़ दिया। वास्तव में ही किसी देश की उन्नति का रास्ता जवान किसान और विज्ञान से होकर ही निकलता है। जवान देश की सीमाओं की सुरक्षा करके हमें शांति पूर्ण परिवेश देता है किसान हमें आर्थिक समृद्घि प्रदान करता है तो विज्ञान हमें समृद्घि और उन्नति के नये-नये मार्ग बताता है।

भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय और प्रशंसनीय उन्नति की है। हमसे सारा विश्व आज ईष्र्या करता है तो इसका एक कारण यह भी है कि हमारे वैज्ञानिकों ने देश को विज्ञान के नये-नये आविष्कार देकर तथा नई-नई तकनीक देकर बहुत आगे बढ़ाया है। जो देश सुई तक विदेशों से मंगाता था, वह आज सुई से लेकर हवाई जहाज तक बना रहा है। 70 वर्ष में इतनी बड़ी उपलब्धियां प्राप्त करना सचमुच गर्व का विषय है। 1973 में अमेरिका ने चंद्रमा की खोज के अपने मिशन में निराशाजनक निर्णय लिया और अपनी असफलताओं के चलते कह दिया कि वह भविष्य में कभी भी चंद्रमा पर जाने की नही सोचेगा। परंतु भारत के वैज्ञानिकों के प्रयासों से प्रेरित होकर अमेरिका ने 2004 में कहा कि हम सन 2020 तक चांद पर जाएंगे और वहां हम मानव बस्तियां भी बसाएंगे। इससे भारत के चंद्रयान मिशन को भी बल मिला। हमारे वैज्ञानिकों के पुरूषार्थी और उद्यमी स्वभाव से प्रेरित होकर हमारे चंद्रयान-1 मिशन में अमेरिका यूरोपीय संघ तथा बुल्गारिया, ने विशेष रूचि दिखाई। नासा के प्रमुख माइकेल ग्रिफिन पहली बार भारत यात्रा पर आये और 9 मई 2006 को वह बंगलूरू पहुंचे। उनके साथ उस समय नासा के कुछ प्रमुख वैज्ञानिक भी थे। उन्होंने इसरो प्रमुख नायर से उस समय भारत में चंद्रयान-1 पर लंबी और सारगर्भित बातचीत की। दोनों में सहमति बनी और अमेरिका ने भारत के अभियान को सफल बनाने के लिए अपनी ओर से दो उपकरण भेजने का अनुबंध किया।

जब भारत ने 1963 ई. में विक्रम साराभाई के नेतृत्व में पहली बार भारतीय रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा था तो उस समय भारत को स्वतंत्र हुए मात्र 16 वर्ष ही हुए थे। उसी समय 1962 का युद्घ चीन से हुआ। बड़ी विकट परिस्थितियों में आगे बढऩे का निर्णय लिया गया था। पर हमारे कदम थे कि आगे बढ़े तो फिर रूके नही, इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने भी अपने पिता पंडित नेहरूजी के समय में अंतरिक्ष की ओर भारत के बढ़ते कदमों को गति देने का निर्णय लिया। 1984 में स्क्वैड्रन लीडर राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में प्रवेश किया तब श्रीमती गांधी ने भारत की प्रधानमंत्री के रूप में श्री शर्मा से भारतवासियों की ओर से पूछा-‘‘राकेश! तुम्हें अंतरिक्ष से भारत कैसा लग रहा है?’’ देश की नेता का प्रश्न जितना मार्मिक था हमारे अंतरिक्ष यात्री श्री शर्मा का उत्तर भी उतना ही मार्मिक था। उन्होंने कहा था-‘‘मैडम! सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।’’ सारा देश मारे खुशी के उछल पड़ा था, सर्वत्र गर्व और गौरव का उत्सव था। देश को लगा था कि हमने सचमुच बड़ा रास्ता तय किया है।

जब 2008 में भारत ने चांद पर तिरंगा फहरा दिया तो विश्व ने पुन: एक बार भारत की बौद्घिक संपदा का लोहा माना। ‘गौरवमयी उपलब्धि’ शीर्षक से अजीत समाचार के संपादक बरजिंदर सिंह हमदर्द ने 16 नवंबर 2008 को अपने संपादकीय में लिखा-‘‘अंतत: भारत ने चंद्रमा पर अपना राष्ट्रीय झण्डा फहरा ही दिया है। इसके लिए जहां अरबों रूपये की धनराशि लगी है वहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने लंबे समय तक दिन रात मेहनत भी की है। निस्संदेह भारत के लिए यह गौरवमयी उपलब्धि है। इससे भारत दुनिया के कुछ ऐसे देशों में सम्मिलित हो गया है जिनकी चांद तक पहुंच बन गयी है। इस क्रम में भारत अमेरिका, रूस तथा जापान के बाद आता है।’’

22 अक्टूबर 2008 को श्री हरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से जिस चंद्रयान-1 रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजा गया था उसमें अधिकतर यंत्र भारतीय ही थे। इस प्रकार की उपलब्धियों से हमारे वैज्ञानिक जहां उत्साहित थे वहीं उन्हें यह बात रह-रहकर साल रही थी कि हमारे देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में (चाहे आंशिक रूप से ही सही) अमेरिका का योगदान हम कब तक लेते रहेंगे? इसलिए वह निरंतर इस दिशा में प्रयासरत रहे कि अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में से अमेरिका को जितना शीघ्र हो सके बाहर कर दिया जाए। क्योंकि अमेरिका के सहयोग से सफल किये जाने वाले कार्यक्रमों से या अभियानों से हमारी प्रसन्नता केवल हमारी बनकर नही रह जाती थी उस पर किसी की कृपा का लेबल लगा होता था। जिससे हमारी बौद्घिक क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगता था। फलस्वरूप हमारे वैज्ञानिकों ने राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े इस प्रश्न का भी उत्तर खोज लिया और सारा देश आज अपने वैज्ञानिकों को बधाई दे रहा है, जब  श्री हरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से 28 अप्रैल को इसरो ने नेवीगेशन सेटेलाइट आर.एन.एस.एस. का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया। इसमें अमेरिका सहित किसी भी विदेशी शक्ति का कोई सहयोग नही लिया गया है। इस उपलब्धि से भारत ‘ग्लोबल पोजिशनिंग’ सिस्टम (जीपीएस) श्रंखला के अंतर्गत 5वां देश बन गया है। अब से पूर्व ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम केवल अमेरिका, रूस चीन और जापान के पास ही उपलब्ध था। अब इसमें भारत ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराके विश्व को आश्चर्य में डाल दिया है। लगभग सभी स्मार्ट फोनों में जीपीएस का फीचर होता है। इसकी सहायता से कोई यूजर अपनी स्थिति और गंतव्य स्थल का बड़ी सहजता से पता लगा सकता है। इसके प्रयोग करने से ट्रेनों, जहाजों की स्थिति जानने जमीन का सर्वेक्षण करने और वैज्ञानिक प्रयोग और सर्विलांस जैसे कार्य सहजता से संपन्न होंगे। दूरस्थ क्षेत्रों की सही स्थिति का पता लग सकेगा, साथ ही देश में यातायात की बिगड़ती जा रही स्थिति पर भी लगाम लग सकेगी। 20 मीटर से भी कम दूरी की सटीक जानकारी हमें मिल सकेगी। विमानों का पता लगाने और उन्हें सही दिशा निर्देश देने में भी सहायता मिलेगी। साथ ही आपदा प्रबंधन भी सरल हो जाएगा। हमारी इस उपलब्धि पर प्रधानमंत्री मोदीजी ने कहा है कि मैं इसरो के सभी वैज्ञानिकों को बधाई देता हूं। अब हम अपना रास्ता स्वयं अपनी तकनीक से निर्धारित करेंगे। यह वैज्ञानिकों की ओर से देश की जनता को दिया गया महान उपहार है।’’ इस महान उपहार को प्राप्त करके सारा देश अपने वैज्ञानिकों का अभिनंदन कर रहा है और आशा करता है कि उनके बौद्घिक नेतृत्व से हम निरंतर आगे बढ़ते जाएंगे और सफलता के नये कीर्तिमान गढेंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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