अपने कांग्रेसी बंधुओं की सेवा में

  • 2016-03-02 03:30:55.0
  • राकेश कुमार आर्य

कांग्रेसी बंधुओं !
इसमें दो मत नही कि आप देशभक्त हैं और आपकी देशभक्ति पर अविश्वास नही किया जा सकता। यह भी सच है कि आपकी पार्टी के बहुत से कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भारत के स्वातंत्रय समर में भाग लिया था, और उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसलिए जो लोग तुम्हें यह कहकर चिढ़ाते हैं कि तुम्हारा देश की स्वतंत्रता की प्राप्ति में कोई योगदान नही रहा, वह अज्ञानी हैं। इस सबके उपरांत भी मैं यह कहना चाहूंगा कि आपकी निश्छल देशभक्ति को तुम्हारे ही नेताओं ने शंका-आशंकाओं में घेरने का कार्य किया है। इन नेताओं में गांधी नेहरू का नाम सबसे ऊपर है। तुम्हें इन दोनों महामानवों के प्रति समर्पित रहने का पाठ पढ़ाया जाता है, और बस यहीं आपकी देशभक्ति पर पहला प्रश्नचिन्ह लग जाता है, क्योंकि आपके लिए राष्ट्र से प्रथम गांधी और नेहरू हो जाते हैं, या कोई एक परिवार हो जाता है। ऐसा नही है कि इस व्यवस्था को तोडऩे वाले आपके बीच नही रहे। कांग्रेस में गांधी के आगमन के काल से ही बेचैनी अनुभव की जाने वाली थी। जिससे कई लोगों ने गांधी के विरूद्घ विद्रोही स्वर निकाले और कांग्रेस में लात मारकर दूर चले गये।
कांग्रेसी बंधुओं


आपको संभवत: यह नही पढ़ाया गया होगा कि गांधी जी प्रारंभ से ही जिद्दी थे, और उन्होंने अपने जिद्दी स्वभाव से ही कांग्रेस में कोई पद न लेकर भी कांग्रेस को पहले दिन से ही अपनी जागीर के रूप में प्रयोग करना आरंभ कर दिया था। अपने ही इतिहास लेखक डा. पट्टाभिसीता रमैया को ही पढ़ लें, वह भी आपको बता देंगे कि गांधीजी में यह दोष था। यह अलग बात है कि डा. पट्टाभिसीता रमैया शब्दों में आपको विनम्र दीखें, पर बात स्पष्ट अवश्य हो जाएगी। गांधीजी की जिद के सामने स्वामी श्रद्घानंद जैसे स्वाभिमानी नेताओं ने झुकने से इंकार किया तो एक दिन कांग्रेस को ही छोडक़र चले गये। यह क्रम यही नही रूक गया था, गांधीजी की नीतियों को दुत्कार कर स्वामी श्रद्घानंद से लेकर सुभाष चंद्र बोस तक अनेकों लोग बाहर चले गये। सबके जाने के समय अलग-अलग थे, परंतु कारण सभी का एक ही था कि कांग्रेस में एक परिवार या एक व्यक्ति के सामने झुका कर व्यक्ति का स्वाभिमान कुचल दिया जाता है। आपके लाड़ले राहुल गांधी ने अपने ही प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के एक महत्वपूर्ण कागज को प्रेस के सामने फाडक़र फेंक दिया था। यह तो मनमोहनसिंह थे जिन्होंने अपनी विनम्रता के कारण अपने स्वाभिमान को एक नौसिखिए लडक़े के जूते तले कुचल जाने दिया, अन्यथा कोई थोड़ा सा भी पौरूष शक्ति संपन्न व्यक्ति यदि होता तो वह ऐसा अपमान सहन नही करता। आपकी एक महिला नेता इंदिरा गांधी भी हुई हैं। वह राहुलजी की दादी थीं। वह अपने मुख्यमंत्रियों को जब फोन करती थीं तो कई मुख्यमंत्री फोन को कुर्सी से उठकर सुनते थे। इतना आतंक था आपकी उस नेता का अपने ही मुख्यमंत्रियों पर। उसने कितने ही नेताओं को आगे नही बढऩे दिया था। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में किसी मुख्यमंत्री को पांच वर्ष तक शासन भी नही  करने दिया था। कितने ही राज्यपालों का दुरूपयोग निजी हित में किया। संविधान को अपने ढंग से चलाया-स्वयं संविधान के अनुसार नही चलीं। उस प्रधानमंत्री की विशेषता थी कि वह आपके किसी बड़े नेता को किसी अहम मुद्दे पर विचार विमर्श के लिए बुला तो लेती थीं, उससे सुझाव भी लेने लगती थीं, और वह सुझाव देता जाता था कि इंदिराजी तेरी बात को बड़े ध्यान से सुन रही हैं-और इंदिराजी बात सुनने के स्थान पर एक कागज को कुछ इस प्रकार पकडक़र बैठती थीं कि सुझाव देने वाले को तो यह लगता था कि इंदिरा जी उसकी बातों को नोट कर रही हैं और इंदिरा जी उस कागज पर फूल बनाकर खेलती जाती थीं। आपके एक नेता ने उत्साहित होकर और साहस करते हुए थोड़ा उचककर एक बार देख लिया था कि इंदिराजी ने उनके कितने सुझाव नोट कर लिये हैं? पर जब उसने देखा कि इंदिरा जी उसके सुझाव नोट करने के स्थान पर कुछ और ही कर रही थीं तो उसे बड़ कष्ट हुआ था। पर बेचारा अपना त्यागपत्र नही दे पाया था। आपका एक युवा नेता संजय गांधी था। वह युवा था और उस समय की तानाशाह प्रधानमंत्री का बेटा था, इसलिए आपका नेता था। उसके पास कोई संवैधानिक पद नही था। पर संविधान को वह तकिया बनाकर सोया करता था। वह एक संविधानेतर संस्था बन गया था और बड़ों-बड़ों को तमाचे मारकर नमस्कार कराता था। आपको तो बताया ही गया है कि यदि कोई एक गाल पर आपको थप्पड़ मारे तो आप दूसरा गाल भी उसके सामने कर दें, इसलिए आपके वे नेता जो आपके युवा नेता से थप्पड़ खाते थे-चुपचाप रह जाते थे। कई तो बेचारे जीवन भर अपनी व्यथा को बता भी नही पाये थे। अब जिस घर में नेताओं को थप्पड़ मारकर सीधा करके रखने की परंपरा रही हो-वहां यदि आपके राहुलजी ने दो कागज फाड़ भी दिये तो क्या हो गया? बच्चा था-कर गया गलती। जैसे जे.एन.यू. के बच्चे गलती कर गये-वैसे ही आपके ‘बच्चे’ ने भी गलती कर दी तो क्या हो गया? यह अलग बात है कि आपका ‘बच्चा’ तो आज भी ‘बच्चा’ ही निकला कि जो ‘बच्चे’ गलती कर रहे थे उन्हीं को यार बनाकर उन्हीं के साथ जा खेला। फिर जब आप अपने ‘पप्पू’ के समर्थन में संसद में लामबंद हुए तो आपको आपका ‘पप्पू’ बिल्कुल वैसे ही देख रहा था जैसे एक अपराधी बालक अपने हिमायतियों को उस समय देखा करता है जब घर पर वे लोग आ चढ़ते हैं जिन्हें वह तंग करके आया था और वे घर पर चढ़ आने वाले लोग बल में भी अधिक सामथ्र्यवान होते हैं। आपका ‘पप्पू’ भाजपा से घबराया या नही यह तो पता नही-पर उस दिन उसकी भावभंगिमा बता रही थी कि आज ‘पप्पू’ इतना समझदार हो गया है कि जनता जनार्दन की प्रतिक्रिया को वह समझ गया है। उसे पता चल गया था कि जे.एन.यू. के बच्चों के साथ उसे जाकर नही खेलना चाहिए था।

पर आपकी और आपके नेताओं की विवशता है कि आप सबको वही कहना है जो आपके नेता के अनुकूल हो। हमारा मानना है कि इस प्रकार की आरती या पूजा की थाली को अपने हाथों से दूर रखिये और अपने नेता को थोड़ा वह इतिहास बताइये या पढ़ाइये जो आपके ही पहले शिक्षामंत्री डा. अबुल कलाम आजाद ने इस देश में पढ़वाना आरंभ किया था और जिसमें ‘अकबर महान’ नामक अध्याय में यह बताया जाता है कि उसने किस प्रकार 13 वर्ष की अवस्था में ही एक विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया था? आप जब अपने ‘बाल स्वभाव नटखट गिरधर’ को ये बतायें तो उसे साथ ही साथ यह भी बतायें कि ‘महाराज! आप साम्राज्य खड़ा नही कर रहे हैं, अपितु आप साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं।’ आपकी अंतरात्मा साहस कर ले तो उसे यह भी बताओ कि आतंकवादी को आतंकवादी कहना सीखो और देशभक्तों को देशभक्त कहना सीखो। आपकी दादी की समाधि को यह देश शक्ति स्थल के रूप में तथा पिता की समाधि को वीरभूमि के रूप में नमन करता है। अत: आपको ‘शक्ति स्थल’ और ‘वीरभूमि’ पर जाकर प्रायश्चित करना चाहिए। आपकी अवस्था 40 वर्ष से ऊपर हो गयी है अब आपकी अवस्था कागज फाडऩे या कुछ नालायक बच्चों के साथ जाकर खेलने की नही है। अगर आप कांग्रेसियों में थोड़ा सा भी साहस है तो अपने स्वाभिमान को जगाओ और इस देश की उन्नति में अपना सहयोग दो। आपके पवित्र मन को यदि मेरे शब्दों से कोई ठेस लगी हो तो कृपया क्षमा करें।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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