अलोकतांत्रिक प्रशासनिक व्यवस्था

  • 2016-05-05 04:22:07.0
  • राकेश कुमार आर्य

वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कुल 75 जिले हैं। आप तनिक उत्तर प्रदेश का मानचित्र उठायें-इस पर अपनी दृष्टि दौड़ाएं। आप देखिए कि कुल 75 जिलों में से केवल 17-18 जिले ही ऐसे हैं जिनका मुख्यालय जिले के लगभग मध्य में आ रहा है। इसी प्रकार देश के सभी राज्यों की राजधानियों की स्थिति है, उनमें से भी अधिकांश अपने-अपने राज्यों के किसी एक कोने में या किसी एक आंचल में स्थित है। देश के अन्य प्रदेशों के जनपदों के मुख्यालयों के विषय में भी ऐसा ही माना जाना चाहिए।

देश में प्रदेशों और जनपदों का निर्माण प्रशासनिक व्यवस्था को जनोपयोगी बनाने के लिए किया जाता है। इसके पीछे उद्देश्य होता है कि देश का प्रशासन और प्रशासनिक अधिकारी लोगों की पकड़ में रहें, लोग जब चाहें तब अपने अधिकारियों से बड़ी सहजता से और सरलता से मिल सकें। इसी व्यवस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था कहा जा सकता है कि प्रशासनिक तंत्र ग्रामोन्मुखी और जनोन्मुखी हो जाए। प्रशासन को जनोन्मुखी और ग्रामोन्मुखी बनाने के लिए आवश्यक है कि जनपदों के मुख्यालय नवसृजित जनपद के लगभग मध्य में होने चाहिए। जिससे कि चारों ओर के जनपद वासियों को अपने जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिलने में कोई असुविधा ना हो। पर हमारे अधिकारीगण लोकतंत्र की इस मूल भावना का ध्यान नही रखते हैं, वह जब भी कोई नव जनपद सृजित करते हैं, तो उसके मुख्यालय की स्थापना में अपने आलस्य और प्रमाद का प्रदर्शन अवश्य करते हैं? अब प्रश्न है कि हमारे अधिकारीगण ऐसा क्यों करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि हम अभी भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के दास हैं। अंग्रेजों की मानसिक दासता का भूत है कि हमारा पीछा ही नही छोड़ रहा है। ध्यान रखना चाहिए कि अंग्रेज लोग जब यहां शासन करते थे तो जनपदों के मुख्यालयों की स्थापना वे अपने हित और सुविधा को दृष्टिगत रखकर किया करते थे। देश में उनके प्रति क्षोभ और रोष का वातावरण रहता था, कब कौन सा क्रांतिकारी कहां क्या कर दे और किस अंग्रेज अधिकारी को अपने प्राण गंवाने पड़ जाएं कुछ नही कहा जा सकता था। इसलिए वे लोग जनपदीय मुख्यालय को ऐसे स्थान पर रखते थे जहां अंग्रेज अधिकारी समय आने पर शीघ्रता से अपनी सेना को पहुंचा भी दें और यदि आवश्यक हो तो जहां से वे शीघ्रता से स्थान छोडक़र भाग भी जाएं। यही कारण था कि अंग्रेज अधिकारी नव जनपद के सृजन के समय यह ध्यान रखते थे कि एक अधिकारी को किसी उपद्रव या हिंसक प्रतिरोध के समय अपने जनपद के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में अपने घोड़े से या अपनी गाड़ी से कितना समय लगेगा? वह ये नही देखते थे कि उनसे मिलने के लिए यदि जन साधारण में से कोई व्यक्ति आता है तो उसे दूर से चलकर उन तक आने में कितना समय लगेगा?

लोकतंत्र और राजतंत्र में या उपनिवेशवादी तानाशाही में यही अंतर होता है। लोकतंत्र लोककल्याण के दृष्टिगत अपनी नीतियों का निर्माण करता है और सोचकर चलता है कि यदि एक नया जनपद सृजित किया जाता है तो जिला मुख्यालय तक आने में एक साधारण व्यक्ति को कितना समय लगेगा? जबकि राजतंत्रीय तानाशाही सोचती है कि जनपद के लोगों के उपद्रव या उनके द्वारा आरंभ की गयी हिंसक क्रांति का शमन करने के लिए जिला मुख्यालय से चलकर संबंधित स्थान पर पहुंचने में अधिकारियों को कितना समय लगेगा? इसका अभिप्राय है कि लोकतंत्र जहां जनभावनाओं का सम्मान करके चलने वाली शासन प्रणाली है वहीं राजतंत्रीय तानाशाही जनभावनाओं का शमन करके चलने वाली शासन प्रणाली है।

बड़ा दुख होता है जब हमारे आज के अधिकारी अपनी नीतियों को क्रियान्वित करते समय केवल यह देखते हैं कि एक अधिकारी अपनी गाड़ी से जिले के एक छोर से दूसरे छोर तक कितनी देर में पहुंच सकता है? यदि वह दूरी दो घण्टा है तो बड़ी प्रसन्नता से कह दिया जाता है कि जिले का दूर से दूर का व्यक्ति भी अधिकतम दो घंटे में अपने जिलाधिकारी तक पहुंच सकता है। जबकि ऐसा नही है।

उत्तर प्रदेश के ही अनेकों जनपद ऐसे हैं जो सौ किलोमीटर से 150 किलोमीटर की लंबाई तक फैले पड़े हैं और उनके जिलाधिकारी जनपद के किसी एक कोने में रहते हैं तो ऐसे जनपदों में गांव से पैदल चलकर जब कोई व्यक्ति प्रात: 7 बजे अपने घर से निकलता है तो उसे अपने अधिकारी तक जाने में ही बारह-एक बज जाता है। तब तक अधिकारी या तो निकल चुके होते हैं या किसी बैठक में व्यस्त होते हैं या अपने नित्यप्रति के मुंह लगे कुछ चाटुकारों और कुछ दलालों से मिलते-मिलते ऊब चुके होते हैं। उनकी मानसिकता उस समय किसी साधारण व्यक्ति से मिलने की नही होती।

उधर हमारे अधिकारियों के कार्यालयों में नियुक्त सुरक्षाकर्मी यद्यपि ग्रामीण आंचल के ही होते हैं-पर उन्हें भी ग्रामीण व्यक्ति को ही ठगने या उत्पीडि़त करने में आनंद मिलता है। इसका एक कारण यह भी है कि ‘साहब’ के मुंह लगे चाटुकार या दलाल तो इन कर्मियों को टुकड़ा डालते नही हैं, तब उनकी  इन ग्रामीण लोगों पर ही ‘दाल गलती’ है जो बड़ा साहस करके किसी प्रकार ‘साहब’ के दरवाजे तक जाते हैं। पर यह क्या? वह जैसे ही द्वार तक पहुंचते हैं-वैसे ही एक कडक़ और निर्मम आवाज कहीं से आती है-‘ऐ बुढ्ढे! क्या है? किससे मिलना है? कहां से आये हो? तुम्हारा क्या काम है?’ प्रश्नों की झड़ी ऐसी होती है कि दूर से प्रार्थना-पत्र लेकर पहुंचा वह ग्रामीण व्यक्ति कांप उठता है, ठिठक जाता है। अपना परिचय देता है। तब कर्मचारी उससे ‘साहब’ से मिलवाने की ‘सुविधा शुल्क’ झाड़ते हैं। ‘सुविधाशुल्क’ न मिले तो बाहर से ही वापस भेज देते हैं। यदि कम ‘सुविधाशुल्क’ मिलती है तो उसे लेकर भीतर जाते हैं फिर बाहर आते हैं और उस ग्रामीण व्यक्ति के हाथ से उसका प्रार्थना पत्र लेकर भीतर चले जाते हैं-फिर बाहर आकर उस ग्रामीण व्यक्ति से कह दिया जाता है कि ‘साहब’ ने आपका प्रार्थना पत्र रख लिया है, अब 10 दिन बाद आना। इस प्रकार ‘साहब’ से बिना मिले ही वह ग्रामीण व्यक्ति घर की ओर चल देता है। क्योंकि उसे घर जाते-जाते अंधेरा हो जाना है-जो अब उसकी आंखों में स्पष्ट पढ़ा जा सकता है।

लोकतंत्र से अपेक्षा थी कि वह एक ग्रामीण निर्धन व्यक्ति की इस निर्मम-कथा को और व्यथा को शांत करेगा। उसके घाव पर औषधियों का लेपन करेगा पर उसने इसके विपरीत घावों पर नमक छिडक़ने का कार्य किया है। हर अधिकारी किसी विशेष वर्ग के लिए कार्य करता सा दीखता है। उसकी दृष्टि में ‘अन्त्योदयवाद’ नही है। यदि हर अधिकारी प्रतिदिन मात्र दस निर्धन असहाय और दूर से आने वाले उपेक्षित लोगों की पीड़ा सुनने के लिए समय निकाले और यह अनिवार्य कर दे कि उसे दिनभर में दस निर्धनों और दमन, दलन व उत्पीडऩ की प्रक्रिया से निकल रहे लोगों की सहायता करनी है तो इस दमनकारी व्यवस्था पर बहुत सीमा तक अंकुश लग सकता है। पर हमारे अधिकारी तो किसी विशिष्ट वर्ग के होकर कुर्सी पर बैठते हैं। इसका परिणाम यह आ रहा है कि देश के ग्रामीण आंचल का इस प्रशासनिक व्यवस्था में विश्वास नही है। यह व्यवस्था केवल कुछ मुट्ठी भर लोगों के भले के लिए चल रही है। लोकतंत्र को इसने सिसकियां लेने पर विवश कर दिया है।

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी इस समय देश के अधिकारियों पर भरोसा करके चलने की बात कहते हैं। उनकी बात उचित हो सकती है-पर उन्हें यह देखना होगा कि जिला स्तर पर बैठे अधिकारी अपने जनपद के निर्धन लोगों की समस्याओं का समाधान क्यों नही कर रहे हैं? पूरी प्रशासनिक व्यवस्था अंग्रेजी ढर्रे पर कार्य क्यों कर रही है-उसमें लोकतंत्र का पुट अभी तक क्यों नही दिखाई दे रहा? जिस दिन अधिकारी वर्ग केवल यह देखना आरंभ कर देगा कि हमें ऐसे स्थान पर बैठना है जहां विकास की अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी मुझसे मिलने के लिए सहजता से आ जाए और मुझसे मिलने में उसे कोई असुविधा न हो-भारत उसी दिन से एक स्वस्थ लोकतांत्रिक देश बनना आरंभ होगा। जब तक ऐसा नही होगा तब तक तो देश के जिला मुख्यालयों के बाहर ठगी का शिकार बना भारत की आत्मा का प्रतिनिधि निर्धन व्यक्ति इस लोकतंत्र को कोसता ही रहेगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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