अब लोकतंत्र नहीं, लोभतन्त्र है

  • 2016-02-08 03:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

अभी पिछले दिनों समाचार पत्रों में एक समाचार सुर्खियों में आया था कि सबसे अधिक बिजली खर्च करते हैं हमारे सांसद। अब नई सुविधओं के अन्तर्गत 50 हजार यूनिट बिजली एक सांसद को मिलेगी। मुफ्त रेलयात्रा की सुविधा तो यथावत रहेगी ही। अब कुछ दिन तक इन सुविधओं की बढ़ोत्तरी को समाचार पत्रों में लोग अपनी प्रतिव्रिफयाओं का निशाना बनायेंगे। अपने-अपने नजरिये से लोग इस सांसद वेतन वृद्धि प्रकरण को लेंगे। कुछ लिखेंगे, गालियाँ देंगे और धीरे-धीरे सारा प्रकरण ठंडा पड़ जायेगा।

देश की जनता के लिए नेताओं का चुनाव करना एक ऐसी स्थिति है कि जिसमें जनता के सामने पुन: कूड़े में से अच्छा कूड़ा छाँटने के लिए डाल दिया जाता है। तब तक हर बार की भाँति यही गन्दे लोग पुन: हमारे प्रतिनिधि बिनकर हमारे सामने आ जायेंगे। मन करता है कि भारत की लोकतान्त्रिक प्रणाली को कूड़ातान्त्रिक प्रणाली कहा जाये तो अच्छा है। loktantrक्योंकि यहाँ साफ स्वच्छ छवि के लोगों को आगे बढऩे से रोकने का और कूड़े मे से ही अपना नेता चुनने की जो एक व्यवस्था बन गयी है उसे लोकतांत्रिक कहना तो केवल लोकतंत्र का उपहास करना है। सारी की सारी व्यवस्था लोभतंत्र के अधीन लोभतंत्र के लिए कार्य कर रही है।
यह शासन व्यवस्था सत्तालोलुप
, पदलोलुप और धनलोलुप लोभियों के लिए बनकर रह गयी है। इसलिए राजनीति से जनसेवा का आवश्यक अंग समाप्त हो गया है। सत्ता सुख और स्वार्थपूर्ति राजनीति का ध्येय बनकर रह गया है। सांसदों के लिए उपरोक्त वर्णित सुविधाएं अधिक नहीं कही जा सकती। यह भी माना जा सकता है कि उनके लिए ऐसी सुविधाएं आवश्यक हो गयी हैं, किन्तु जिस देश के करोड़ों लोगों को वर्तमान समय में भी एक बल्ब तक की रोशनी उपलब्ध् नहीं हैं, जिस देश के किसान बिजली न मिलने के कारण और  अपनी निर्धनता के कारण आत्महत्या कर रहे हों, जिसमें निर्धनता की रेखा का न्यूनतम स्तर मात्र 300 रुपए मासिक की कमाई रखा गया हो और फिर भी करोड़ों की संख्या में लोग इस रेखा के नीचे का जीवन यापन करने के लिए विवश हों। उस देश में सांसदों की वेतन वृद्धि बड़े सहज भाव से कर दी जाये, बस यही आश्चर्य और दु:ख का विषय है। बड़ा मार्मिक प्रश्न है कि
क्या किसी जननेता को भूख से मरती जनता की दयनीय स्थिति देखकर भी सुखों का उपभोग करने का नैतिक अधिकार है
? यदि ऐसा है तो फिर राजतंत्र, एकतंत्र और लोकतंत्र में अन्तर ही क्या रह गया? प्रधानमंत्री चाणक्य के इस देश के प्रतिनिधि झोपड़ी में नहीं रह सकते तो प्रधानमंत्री से आप क्या अपेक्षा करेंगे? वह तो झोपड़ी की ओर झाँकेगा भी नहीं। बस यही कारण है कि इस देश में झोपड़ी का फूंस रोज उड़ रहा है, लोग फुटपाथ पर आ रहे हैं और महलों की अट्टालिकाऐं रोज ऊंची होती जा रही हैं, आर्थिक विषमता इतनी भारी है कि आज अमीरी भी अपनी स्थिति पर शर्मा रही है। जब वह गरीब की दयनीय स्थिति को देखती है तो अपनी उच्चावस्था भी उसे अच्छी नहीं लगती। हमारे धूर्त नेता जब आरक्षण को जातिगत आधार पर प्रदान करते हैं तो अमीरी भी चीत्कार कर उठती है।
मानो वह भी नहीं चाहती कि किसी गरीब की बेटी की डोली के लिए अथवा इसी प्रकार की किसी अन्य सामाजिक रस्म की पूर्ति के लिए लोग उसे आर्थिक सहायता इसलिए ना दें कि वह तो तथाकथित अगड़ी जाति की है।


अगड़ी जाति में जन्म लेने को उसी प्रकार अभिशाप बनाने की हठ हमारे मूर्ख नेता कर रहे हैं जिस प्रकार कभी तथाकथित ब्राह्मण वर्ग ने छोटी जातियों के लोगों के प्रति दिखाई थी। एक दुष्टता का प्रतिकार करने के लिए नई दुष्टता की खेाज करना बुद्धिमता नहीं कही जा सकती। यदि पहली दुष्टता ने सामाजिक विद्वेष उत्पन्न किया और उसके कटुपफलों को हमने अनुभव किया तो नये परिवेश में आवश्यक है कि पहली व्यवस्था समाप्त हो और नई व्यवस्था इस रूप में विकसित हो कि समाज से जाति व्यवस्था समाप्त हो जाये।

समाज से गरीबी दूर करने के लिए गरीब को समाप्त किया जा रहा है। दूसरी ओर अपने वेतन बढ़ाये जा रहे हैं। यह राजनीति के पवित्र धर्म के प्रति छल है। तथाकथित अगड़ी जतियों के गरीबों को एक-झटके में अमीर मान लिया गया है जबकि पिछड़ों में रईसों को भी आरक्षण का पात्र मानकर गरीब मान लिया गया है। सचमुच हमारे मान्यवर सांसदों की बुद्धि दया की पात्र बन गयी है।

राजनीति जब तक अपने सेवा के पवित्र धर्म को नहीं अपनायेगी तब तक इसे लोग सन्देह और उपेक्षा की दृष्टि से देखते रहेंगे। हमारे सांसदों को अपनी वेतन वृद्धि के मामले में भी पूर्ण पारदर्शिता दिखाते हुए वेतन आयोग का गठन अपने लिए भी करना चाहिए। जब तक शासन जनता का स्वयं को सेवक मानता है तब तक कोई शासन प्रणाली लोगों को बुरी नहीं लगती, किन्तु
जब शासन स्वयं को जब शासन स्वयं को जब शासन स्वयं को जनता का स्वामी मानने लगता है तब अच्छी से अच्छी शासन प्रणाली भी लोगों के लिए बोझ बन जाती है।
आज यदि देखा जाये तो लोकतन्त्र भी लोगों के लिए बोझ बन गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह शासन प्रणाली भी विश्व को उत्तम व्यवस्था नहीं दे पायी है। यह इसकी अक्षमता है जो सिद्ध हो चुकी है। इसके लाने के पीछे लोगों का विचार था कि इससे श्रेष्ठ लोगों को राजनीति में आगे लाया जा सकेगा जिससे श्रेष्ठ समाज का निर्माण होगा।

वस्तुत: यह श्रेष्ठों का श्रेष्ठों के लिए शासन तंत्र था, किन्तु आज बुरे लोगों ने श्रेष्ठों को उसी प्रकार पीछे कर दिया है जिस प्रकार बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है। अच्छे लोगों का प्रचलन से बाहर होना सचमुच चिन्ता का विषय है, एक भी सांसद निर्धन की झोपड़ी की चिन्ता करता हुआ झोपड़ी में रहकर गुजारा करने की बात करता नहीं दिखता। उसे ऐश्वर्य चाहिए, तडक़-भडक़ चाहिए, राजकीय सुख और वैभव चाहिए और इनसे बढक़र चाहिए विलासिता।

तब कैसे होगा राष्ट्र का कल्याण, जनगण का उद्धार और जन-जन का उत्थान? इन तीनों चीजों के प्रति अरूचि दर्शाते हमारे सांसद इतिहास के लिए एक बोझ हैं। इन्हें इतिहास उपेक्षा के कूड़ेदान में फेंककर स्वयं पीछे लौट जायेगा, पीछे कहाँ? वहीं जहाँ से वह स्वयं जनता को आन्दोलित कर उसे कुम्भकर्णी नींद से उठा देगा। अत: समय रहते इतिहास को नया मोड़ दें, अन्यथा अनर्थ हो जाएगा।

देश में प्रजातंत्र की स्थिति दिन प्रतिदिन विकृत होती जा रही है। कभी विधायिकाओं में विधयकों के मध्य जूते चलने की असभ्यता होती है तो कभी देश की संसद में सांसदों द्वारा एक-दूसरे पर हाथ उठाने और गाली-गलौज की घटनाऐं होती हैं। देश के प्रतिनिधियों की इस हालत को देखकर बुद्धिजीवी वर्ग को इन पर तरस आता है तो वहीं देश की जनता को अचम्भा होता है वह अपने को ठगा सा अनुभव करती है कि हमारे द्वारा चुने गए प्रतिनिधि विदेश के विकास और प्रतिष्ठा को भूल कर देश के प्रतिष्ठित सदन में जूतम पैजार करने में लगे है।

इससे एक बात साफ है कि आने वाले दिनों में प्रजातंत्र नितान्त खोखला हो चुकेगा और लोगों का सांसदों व अन्य प्रतिनिधियों पर से भरोसा डिग जायेगा। इससे स्पष्ट होता है कि प्रजातंत्र नाम की कोई चीज इस देश में नहीं होगी। समय रहते देश के लोगों को और उससे भी अधिक जनता के प्रतिनिधियों को इस गंभीरता को समझना होगा और अपने उत्तरदायित्वों को ठीक ढंग से निर्वहन करना होगा नहीं तो आज तो संसद की चमक कहीं विलीन हुई है कल प्रजातंत्र शब्द ही शब्द कोष से विलीन हो जायेगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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