आनन्द और उल्लास का पर्व मदनोत्सव

  • 2016-02-27 09:30:03.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

भारतीय समाजशास्त्र में वर्ष के बारह महीनों को छ: ऋतुओं में बाँटा गया है जिसमें प्रीति पूर्वक परस्पर सहसम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रत्येक जीव-जन्तु के लिए भिन्न-भिन्न ऋतुएँ होती हैं,परन्तु मनुष्य के लिए ऋषियों ने वसन्त ऋतु को ही सर्वाधिक उपयुक्त मानकर वसन्तपञ्चमी के दिन इसके स्वागत पर उत्सव मनाने का भी संकेत दिया है।जाड़े की ऋतु के पश्चात वसन्त की शीतोष्ण वायु जैसे ही तन-मन का स्पर्श करती है, सम्पूर्ण मानवता शीत की ठिठुरन छोड़ कर आनन्द और प्रस्फुरण का अनुभव कर हर्षोल्लास मनाने लगती है। यही कारण है कि ऋतुओं का राजा वसन्त सदा से ही कवियों , साहित्यकारों और रसिकजनों का भी प्रिय विषय रहा है। वैदिक ग्रन्थों से लेकर वर्तमानयुगीन साहित्यों में अर्थात प्रत्येक युग के भारतीय साहित्य में वसन्त के आनन्द, उत्प्रेरण और मनबहलावों का मनोरंजक वर्णन अंकित मिलता है। संस्कृत के प्राय: समस्त काव्यों, नाटकों, कथाओं में कहीं न कहीं वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव का वर्णन अवश्य ही अंकित मिलता है।पुरातन साहित्यों के अनुसार प्राचीन काल में वसन्त में वन विहार, झूला दोलन (झूले पर झूलना), फूलों का श्रृंगार और मदन उत्सव मनाने की अदभुत परम्परा थी। भारतीय पुरातन ग्रन्थ इस बात का भरपूर प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि प्राचीनकाल से ही हमारे देश में वसन्तोत्सव, जिसे कि मदनोत्सव के नाम से भी जाना जाता है, मनाने की अद्भुत, विशाल और मनमोहक परम्परा रही है। प्राचीनकाल में वसन्तोत्सव का दिन कामदेव के पूजन का दिन होता था और वसन्तपञ्चमी के बाद पूरे दो महीने तक वसन्तोत्सव अर्थात मदनोत्सव का कार्यक्रम चलता रहता था।आज भी भारतवर्ष का मौसम इस समय अर्थात वसन्त काल में इसी रंग में रंगा नजर आता रहता है, जो वास्तव में प्रेमी-प्रेमिकाओं का ही मौसम होता है। होली का उत्सव इसका चरमबिन्दु है, जब रस के रसिया का एकाकार हो जाता है। वसन्त काम का सहचर है , इसीलिए भारतवर्ष में वसन्त ऋतु में मदनोत्सव मनाने का विधान है।पुरातन काल से ही भारतवर्ष में काम को निकृष्ट नहीं मानकर दैवी स्वरूप प्रदान कर उसे कामदेव के रूप में मान्यता दी गई है। यदि काम इतना विकृत होता तो भगवान शिव अपनी क्रोधाग्नि में काम को भस्म करने के बाद उसे अनंग रूप में पुन: क्यों जीवित करते ? इसका अर्थ यह है कि काम का साहचर्य उत्सव मनाने योग्य है। जब तक वह मर्यादा में रहता है , उसे भगवान की विभूति माना जाता है,लेकिन जब और जैसे ही वह मर्यादा छोड़ देता है तो आत्मघाती बन जाता है , शिव का तीसरा नेत्र (विवेक) उसे भस्म कर देता है। भगवान शिव द्वारा किया गया काम-संहार मनुष्य को यही शिक्षा देता है ,समझाता है।मदनोत्सव


वेदों, उपनिषदों, पुराणों में काम के प्रति सहजता का एक भाव पाया जाता है। सम्पूर्ण पुरातन भारतीय साहित्य काम की सत्ता को स्वीकार करता है और जीवन में काम की महत्वपूर्ण भूमिका को मानकर जीवन जीने की सलाह देता है । पुरातन ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि प्राचीन काल में वसन्तपञ्चमी का दिन मदनोत्सव और बसन्तोत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस दिन स्त्रियाँ अपने पति की पूजा कामदेव के रूप में करती थीं ।वसन्तपञ्चमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव हदय में प्रेम एवं आकर्षण का संचार किया था और तभी से यह दिन वसन्तोत्सव तथा मदनोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। आनन्द,उल्लास और लोकानुरंजन के इस उत्सव को मदनोत्सव, वसन्तोत्सव, कामदेवोत्सव, कौमुदी महोत्सव, और शरदोत्सव आदि नामों से पुरातन साहित्य में अंकित किया गया है और इसमें काम और रति की पूजा का विधान है। कालिदास इसे ऋतु-उत्सव भी कहते हैं ।मदनोत्सव का अधिष्ठाता कामदेव को भारतीय शास्त्रों में प्रेम और काम का देवता माना गया है। उनका स्वरूप युवा और आकर्षक है। वह विवाहित हैं और रति उनकी पत्नी हैं। वह इतने शक्तिशाली हैं कि उनके लिए किसी प्रकार के कवच की कल्पना नहीं की गई है। उनके अन्य नामों में रागवृंत, अनंग, कंदर्प, काम, विश्वकेतु,मन्मथ, मनसिजा (मनोज), मदन, प्रद्युमन, मीनकेतन, मकरध्वज,रतिपति, रतिनायक, दर्पक, पञ्चशर, स्मर, शंबरारि, कुसुमेषु, अनन्यज, रतिकांत, पुष्पवान, पुष्पधन्वा आदि प्रसिद्ध हैं। यूनान में ये क्यूपिड है। कामदेव, हिंदू देवी श्रीलक्ष्मी के पुत्र और कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का अवतार हैं। कामदेव के आध्यात्मिक रूप को हिंदू धर्म में वैष्णव अनुयायियों द्वारा कृष्ण को भी माना जाता है। जिन्होंने रति के रूप में सोलह हजार पत्नियों से महारास रचाया था और व्रजमण्डल की सभी गोपियाँ उन पर न्यौछावर थीं।

भारतीय पुरातन साहित्य में कामदेव की कल्पना एक अत्यन्त रूपवान युवक के रूप में की गई है और ऋतुराज वसन्त को उसका मित्र माना गया है ।कामदेव के पास पाँच तरह के बाणों की कल्पना भी की गई है।य़ह हैं सफेद कमल, अशोक पुष्प, आम्रमंजरी, नवमल्लिका, और नीलकमल। वह तोते में बैठ कर भ्रमण करते हैं।कामदेव का धनुष प्रकृति के सबसे ज्यादा मजबूत उपादानों में से एक है।यह धनुष मनुष्य के काम में स्थिरता-चंचलता जैसे विरोधाभासी अलंकारों से युक्त है। इसीलिए इसका एक कोना स्थिरता का और एक कोना चंचलता का प्रतीक होता है। वसन्त, कामदेव का मित्र है इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है। इस धनुष की कमान स्वर विहीन होती है अर्थात कामदेव जब कमान से तीर छोड़ते हैं, तो उसकी आवाज नहीं होती।

इसका मतलब यह अर्थ भी समझा जाता है कि काम में शालीनता जरूरी है। तीर कामदेव का सबसे महत्वपूर्ण शस्त्र है। यह जिस किसी को बेधता है उसके पूर्व न तो आवाज करता है और न ही शिकार को सम्भलने का मौका देता है। इस तीर के तीन दिशाओं में तीन कोने होते हैं, जो क्रमश: तीन लोकों के प्रतीक माने गए हैं। इनमें एक कोना ब्रह्म के अधीन है, जो निर्माण का प्रतीक है। यह सृष्टि के निर्माण में सहायक होता है। दूसरा कोना विष्णु के अधीन है, जो ओंकार या उदर पूर्ति (पेट भरने) के लिए होता है। यह मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा देता है। कामदेव के तीर का तीसरा कोना महेश (शिव) के अधीन होता है, जो मकार अर्थात मोक्ष का प्रतीक है। यह मनुष्य को मुक्ति का मार्ग बतलाता है, अर्थात काम न सिर्फ सृष्टि के निर्माण के लिए जरूरी है, प्रत्युत मनुष्य को कर्म का मार्ग बतलाने और अन्त में मोक्ष प्रदान करने का मार्ग भी सुझाता है। कामदेव के धनुष का लक्ष्य विपरीत लिंगी होता है। इसी विपरीत लिंगी आकर्षण से बंधकर पूरी सृष्टि संचालित होती है। कामदेव का एक लक्ष्य स्वयं काम हैं, जिन्हें पुरुष माना गया है, जबकि दूसरा रति हैं जो स्त्री रूप में जानी जाती हैं। कवच सुरक्षा का प्रतीक है। कामदेव का रूप इतना बलशाली है कि यदि इसकी सुरक्षा नहीं की गई तो विप्लव ला सकता है। इसीलिए यह कवच कामदेव की सुरक्षा से निबद्ध है। यानी सुरक्षित काम प्राकृतिक व्यवहार केलिए आवश्यक माना गया है, ताकि सामाजिक बुराइयों और भयंकर बीमारियों को दूर रखा जा सके।
-अशोक प्रवृद्ध

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