आज भी नारी भारत में ही सर्वाधिक सुरक्षित है

  • 2016-05-26 06:15:53.0
  • राकेश कुमार आर्य

नारी

भारत के विषय में कर्नल टॉड ने बहुत कुछ ऐसा लिखा है, जिस पर हर भारतीय को गर्व और गौरव की अनुभूति होना स्वाभाविक है। भारत में नारी के विषय में कर्नल टॉड कहते हैं-‘‘यदि नारी के प्रति समर्पण को सभ्यता का मापदण्ड माना जाए तो राजपूतों का स्थान सर्वोपरि होगा। उनकी संवेदनशलता चरमसीमा पर है तथा नारी के प्रति किये थोड़े से अपराध के प्रति भी उनके हृदय में क्रोध की ज्वाला भडक़ उठती है और वे इसे कभी भी क्षमा नही करते। नारी की सुकुमारता के संबंध में अनजाने में किया गया एक व्यंग्य राठौर एवं कछवाहों के मध्य संबंध विच्छेद का कारण बन गया और जिन मराठों को उन्होंने संगठित रहकर कुचल दिया था उनके समक्ष दोनों को धराशायी होने को बाध्य होना पड़ा और एक देखने में तुच्छ से लगने वाले मजाक ने चित्तौड़ के सिंहासन के ज्येष्ठता के अधिकार को संकट में डाल दिया।’’

प्रो. एच.एच. विल्सन का कहना है-‘‘यह पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि किसी भी अन्य प्राचीन राष्ट्र में नारियों का इतना सम्मान नही था, जितना हिंदुओं में था।’’ भारत में नारी सदा सुरक्षित रही है। आज भी विश्व के किसी भी अन्य देश की अपेक्षा नारी के प्रति सर्वाधिक सम्मानपूर्ण भाव और भाषा का प्रयोग किया जाता है। पर दुर्भाग्यवश इस देश में ऐसे लोग हमारे मीडिया और प्रचारतंत्र पर प्रभावी हो गये जिन्हें पश्चिम का भोपूं या विदेशों का एजेंट कहा जाए तो कुछ अतिशयोक्ति नही होगी। मैं मानता हूं कि व्यवस्था में कहीं कमियां या दोष आ गये परंतु उसका अभिप्राय यह तो नही था कि सारी व्यवस्था ही त्याज्य हो गयी थी। जब हम 70 वर्षों में अपने संविधान में 100 से अधिक संशोधन कर उसे समायानुकूल बना सकते हैं, तो देश, काल, परिस्थिति के अनुसार आर्ष-ग्रंथों की की गयी दोषपूर्ण व्याख्या को भी संशोधित किया जा सकता था। पर ऐसा नही किया गया। आर्ष साहित्य में केवल कमियां खोजी गयीं, और हम देखते हैं कि हमारी प्रवृत्ति ही केवल परदोषान्वेषी की हो गयी। हम दूसरे के लेख पढ़ते जाते हैं और उसमें साथ-साथ कमियां खोजते जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे कि लेख भी परदोषान्वेषण के लिए ही पढ़ा जा रहा है। उसमें हमारे लिए ग्राह्य कुछ भी नही है। जबकि होना यह चाहिए कि उसमें जितना सार है उसे ग्रहण कर लो थोथे को उड़ा दो और भी सुंदर बात तो यह होगी कि जो आपको थोथा लगता है उसकी प्रमाणिकता की जांच कर लो। इससे ज्ञानवर्धन तो होता ही है साथ ही हमारी सहिष्णुता में भी वृद्घि होती है।

नारी को लेकर मनु महाराज पर कई आरोप जड़े जाते हैं, पर मनु को ना तो पढ़ा जाता और ना ही समझा जाता। जैसे किसी लेख के लेखक की सौ पंक्तियों में से दस पांच पंक्तियां हमारी रूचि के विरूद्घ आ जाने पर उससे कुछ लोग बिना विचारे भिडऩे की तैयारी कर लेते हैं। हम नही सोचते कि उस लेखक की सौ में से 90 पंक्तियां तो ठीक हैं और वह आपके द्वारा भी अधिकतम अंक ले रहा है, आपके ही विचार को बढ़ा रहा है, तो उससे भिडऩे की क्या आवश्यकता है? वैसे ही हम मनु महाराज के पीछे शूद्र या नारी की स्थिति को लेकर पड़ जाते हैं। तनिक विचार करें, मनु महाराज क्या कहते हैं-

(1) यदि एक पत्नी की मृत्यु हो जाये तो पति को अधिकार है कि वह दूसरा विवाह कर सकता है। (मनु. अध्याय 5 श्लोक 168) इसी प्रकार पत्नी का एक पति मर जाए तो पत्नी दूसरे पति के साथ विवाह कर सकती है। (संदर्भ : मनु माधव एवं विद्यानाथ दीक्षित द्वारा उद्घृत पाराशर स्मृति, नारद, कृष्णाचार्य द्वारा लिखित अग्नि पुराण में उद्घृत याज्ञवल्क्य स्मृति आदि सभी विधवा विवाह की साक्षी देती हैं)
इससे स्पष्ट है कि विधवा का पुनर्विवाह भारत में प्राचीनकाल से होता आया है। यदि इसे किसी ने मध्यकाल में निषिद्घ किया तो वह अनुचित था, निंदनीय था।
(2) यदि कोई पत्नी मद्यपान या अनैतिकता की अभ्यस्त हो जाती है तो उसका पति दूसरा विवाह करने के लिए स्वतंत्र है। (मनु. अध्याय 9 श्लोक 80, याज्ञवल्क्य पृष्ठ 416 श्लोक 73) यदि एक पति पतित हो जाता है तो उसकी पत्नी को भी अधिकार है कि वह दूसरा विवाह कर सकती है। (मनु. माधव तथा उपरोक्त कई अन्यों द्वारा उद्घृत)
(3) यदि कोई पत्नी बांझ हो तो उसका पति संतान प्राप्ति के लिए दूसरी पत्नी से विवाह कर सकता है। (मनु. अ. 9 श्लोक 81)
यदि पति नपुंसक हो तो उसकी पत्नी दूसरे व्यक्ति से विवाह करने के लिए स्वतंत्र है। (मनु. तथा उपरोक्त उद्घृत कई अन्य)
(4) किसी विशेष परिस्थिति में पत्नी अपने पति के साथ सहवास करने से मना कर सकती है।
(5) यदि पति अपनी पत्नी को त्याग देता है तो उसकी पत्नी दूसरा विवाह कर सकती है। (मनु. अध्याय 9 श्लोक 76)
(6) यदि कोई पत्नी अपने पति से घृणा पूर्वक व्यवहार करती है तो वह अपनी पत्नी के साथ सहवास करने से मना कर सकता है। (मनु. अध्याय 9 श्लोक 77)
(7) पति का सम्मान होना आवश्यक है। (मनु. अध्याय 3 श्लोक 154) पत्नी का भी सम्मान होना चाहिए (मनु. अ. 3 श्लोक 55)
(8) एक अच्छी पत्नी अपने घर को चमकाती है और वह धन की देवी है। (मनु. अध्याय 11 श्लोक 26)

भारत के इतिहास के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जब माता या पत्नी ने स्वयं अपने हाथों से रण-गणवेश पहनाकर अपने पुत्र या पति को यह कहकर भेजा है कि या तो विजयी होकर लौटना या देश धर्म के लिए बलिदान हो जाना, पर युद्घभूमि से भागकर हमें लज्जित मत करना। क्योंकि हमारी माताएं जब बच्चों को दुग्धपान कराती थीं तो मां भारती का रक्षक बनाने का गीत अपने बच्चे के लिए गाती थीं। इस प्रकार मां अथवा नारी भारतमाता का ही साक्षात रूप होती थीं और यह भी सच है कि ऐसे कितने ही अवसर आये जब माता या पत्नी ने युद्घभूमि से भागकर आये अपने पुत्र या पति को धिक्कारा और उसे उसके क्षत्रियत्व का बोध कराया। यदि नारी को यहां समानाधिकार प्राप्त नही होते तो युद्घभूमि से भागे अपने पुत्र या पति को धिक्कारने और उसे पुन: युद्घभूमि के लिए भगाने का अधिकार नारी को नही मिलता। इस प्रकार भारत में नारी वासना की नही-राष्ट्र साधना की प्रतीक थी। उसका जीवन अपने बच्चों को राष्ट्रसाधना के लिए समर्पित कराने वाला होता था।

अब वर्तमान पर थोड़ा दृष्टिपात करें। आज भी भारत के ग्रामीण आंचल में (जो कि वास्तविक भारत है और इंडिया बनने की क्रांति से अभी अछूता है) यदि एक बच्ची को किसी का पैर लग जाए तो लोग उस देवी के चरण छूते हैं यह सोचकर कि मुझसे तो यह अपराध हो गया। उसे वासना का रूप समझने वाले संप्रदायों में क्या ऐसा है? दूसरे दो पक्ष यदि लड़ रहे हैं और उनके मध्य यदि कोई नारी बीच-बचाव के लिए आ जाए तो दोनों की लाठियां हाथ से छूट जाती हैं। विवाद समाप्त हो जाता है। हो सकता है इंडिया में ऐसा न होता हो पर मेरे भारत में ऐसा होता है। तीसरे किसी भी पर नारी को बहन कहने की परंपरा भी मेरे भारत की है। बहन कहने से कभी भी हम परनारी को वासनात्मक दृष्टि से नही देख पाएंगे और अपने मन के भेडिय़ा को नियंत्रण में रख सकेंगे। इंडिया में परनारी को ‘मैडम’ कहा जाता है अर्थात सारी संभावनाओं को खुला छोड़ दिया जाता है। यह भी मेरा भारत ही है जहां 80 वर्ष का साधु 18 वर्ष की युवती से ‘माता’ कहकर बात करता है। क्योंकि इस अवस्था में एक युवती मातृत्व धारण करने के योग्य हो जाती है। पांचवें 50-60 वर्ष की अवस्था में जाते ही भारत के लोग 30-40 वर्ष की युवतियों को भी बेटी कहकर बोलने लगते हैं। जबकि विदेशों में 70-80 वर्ष का बूढ़ा व्यक्ति भी किसी युवती का चुम्बन लेने का प्रयास करता है। है ना मेरा भारत महान। इधर इंडिया के जे.एन.यू. को देखिए जहां प्रतिदिन हजारों कंडोम कूड़े में मिलते हैं, टी.वी. पर एक लडक़ी बता रही थी कि प्रोफेसर भी उनके साथ दुष्कर्म करने में सम्मिलित होते हैं। लडक़ी का कहना था कि निर्भया के दुष्कर्म करने वालों को अशिक्षित और गवार कहकर यह माना गया था कि उनसे ऐसे अपराध की अपेक्षा की जा सकती थी, पर ये शिक्षित और सभ्य लोग जेएनयू के भीतर क्या कर रहे हैं? ‘इंडिया’ की इस स्थिति पर किसी का ध्यान नही है। यह इंडिया ही है जो नारी को अपमानित कर रही है।

हमें कभी-कभी अपनी विशेषताओं पर भी चिंतन कर लेना चाहिए, हो सकता है हम कहीं दोषी हों, पर हमारे पास ऐसा भी कुछ हो सकता है जो हमें जिजीविषु और जीवंत रख सकता है। चिंतन के दूसरे पक्ष में निश्चय ही जीवन का आनंद छिपा है। यदि हमने इस आनंद के रहस्य को खोज लिया और विश्व को यह बताने में सफल हो गये कि देखिए हम आज भी कितने बड़े ‘पूंजीपति’ हैं तो हमारा ही नही विश्व का भी कल्याण हो जाएगा अपने कंगाल होने का रोना तो हमें अब बंद कर ही देना चाहिए। विश्व हमारा बौद्घिक नेतृत्व चाहता है और हम हैं कि उधर से मुंह फेरकर अपने ‘दाद’ खुजाने में लगे हैं और अपने आपको लहूलुहान कर लिया। यह ‘दाद’ खुजाने की परंपरा हमें हमारे शत्रुओं ने दी है, जिन्होंने हमें केवल हमारे दोष ही दोष बताये है, गुणों को तो हमें खोजना है।

Tags:    नारी   

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.