आज के विश्व की चिंता

  • 2016-04-27 03:30:47.0
  • राकेश कुमार आर्य

विश्व की चिंता

वर्तमान विश्व की परिस्थितियों पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि सारा संसार विस्फोटक स्थिति में जी रहा है। कब, कहां और क्या हो जाए कुछ कहा नही जा सकता। इस्लामिक आतंकवाद से सारा संसार जूझ रहा है, एक अच्छी बात ये है कि इस प्रकार के आतंकवाद के विरूद्घ बहुत से मानवतावादी या शांतिप्रिय मुस्लिमों ने भी आवाज उठायी है और मानवजाति की सुरक्षार्थ आतंक के रास्ते की निंदा की है।

ओसामा बिन लादेन को कभी अमेरिका ने ही खड़ा किया था, परंतु एक समय आया कि लादेन ने अमेरिका को ही आंखें दिखानी आरंभ कर दीं। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अमेरिका को ही लादेन का अंत करना पड़ा। कई लोगों ने इसे कई प्रकार से देखा है और कई प्रकार से इस पर लिखा है। परंतु यदि इसे भारतीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यही कहना पड़ेगा कि ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्तकर्म शुभाशुभम्’ अर्थात किये गये शुभ अशुभ कार्य का परिणाम अवश्य ही भोगना पड़ता है। लादेन जिस रास्ते पर बढ़ा उसका परिणाम यही आना था। पर उसे गलत रास्ते पर बढ़ाने वाले अमेरिका को भी क्या उसके शुभ अशुभ कार्य का परिणाम मिल गया है? इस प्रश्न पर भी विचार करने की आवश्यकता है। अमेरिका ने अपनी ओर से पूर्ण सावधानी बरतते हुए लादेन को तैयार किया था, पर फिर भी वह अपने हाथ जला बैठा। आतंकवाद को कभी बढ़ावा देने वाला अमेरिका आज जिस आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है उसमें उसके अपने पापकर्मों की भी भूमिका है। इसके अतिरिक्त बहुत बड़े स्तर पर अमेरिका को आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है। आतंकवाद से जारी युद्घ में अमेरिका यदि पीछे हटता है तो सबसे अधिक खतरा उसी के लिए है। आतंकियों के गुरिल्ला युद्घ को अमेरिका कभी समाप्त नही कर पाएगा। इस प्रकार के युद्घ के सामने किसी भी प्रकार की सैनिक शक्ति अथवा गोला बारूद काम नही आते हैं। अमेरिका इस युद्घ में जब से फंसा है तब से उसके विज्ञान के क्षेत्र में किये जा रहे रचनात्मक और खोजपूर्ण कार्यों पर भी प्रभाव पड़ा है। हम एक प्रकार से अघोषित तीसरे विश्व युद्घ के दौर में जी रहे हैं अमेरिका सहित कई देश इस समय आतंकवाद से सांप छछूंदर वाली लड़ाई लड़ रहे हैं। वे इसे निगल भी नही सकते और छोड़ भी नही सकते।

इस समय सारा विश्व जिस प्रकार की बेचैनी में जी रहा है वह कोई शुभसंकेत नही है। बेचैनी और अशांति ज्यों-ज्यों बढ़ रही है त्यों-त्यों हर देश अपने आपको असुरक्षित अनुभव करता जा रहा है। हर देश को अपनी एकता और अखण्डता को बनाये बचाये रखने का खतरा मंडराता दिख रहा है। इसका कारण केवल ये है कि सारे संसार के देशों ने ही भारत की संस्कृति से मुंह फेरकर पश्चिमी जगत की भोगवादी संस्कृति को अपना लिया। इस संस्कृति में भोगभाद तो है ही साथ ही लोभवाद भी है। भोगवाद में संचय की प्रवृत्ति बढ़ती है और संचय की प्रवृत्ति से लोभ का जन्म होता है। लोभ से व्यक्ति एक दूसरे के अधिकारों का पहले तो प्रेम से हनन करने का कार्य करता है परंतु जब उसके प्रेमपूर्ण चातुर्य का ज्ञान दूसरे को होने लगता है तो फिर वह उग्र हो उठता है। उसकी उग्रता से क्रोध जन्म लेता है और क्रोध बुद्घि नाश का कारण बनता है। बुद्घिनाश सर्वनाश को जन्म देता है।

जिस भोगवादी विश्व व्यवस्था को हमने अपनाया उसने इसी रास्ते को अपनाया। एक दूसरे के कलेजा को खाने के लिए पहले अमेरिका जैसे देशों ने चुपचाप स्वार्थ का खेल खेला, कहीं लादेन को जन्म दिया तो भारत जैसे देशों के लिए उसके पड़ोसी देश को उकसाया और फिर बाद में अपने हथियार उस देश को बेचकर अपना व्यापार चमकाया। अमेरिका की देखादेखी दूसरे देशों ने भी उसकी नकल की। सारे स्वार्थ में नंगे हो गये। चुपचाप हथियार बनाते रहे, परमाणु शक्ति संपन्न होकर एक दूसरे पर अपना मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने लगे कि हमसे कुछ मत कहना, हम परमाणुशक्ति संपन्न है। जब इन परमाणुशक्ति संपन्न देशों की  इस प्रकार की धमकाने की नीति को छोटे देशों ने देखा तो उन्होंने भी इनका अनुकरण करना आरंभ कर दिया। उन्हें लगा कि परमाणु शक्ति संपन्न होना अनिवार्य है तभी इन बड़ों के साथ बैठा जा सकता है। इसलिए इस्राइल और उत्तरी कोरिया जैसे देशों ने भी परमाणु बम बनाने आरंभ कर दिये। इससे तथाकथित बड़े देशों को झटका लगा और वे यह सोचने पर बाध्य हुए कि अब इन छोटों को भी साथ लिया जाए। पर इसे उन्होंने खुलेमन से ना तो स्वीकार किया और ना ही कहीं प्रकट किया।

अब उत्तरी कोरिया में एक तानाशाह जन्म ले चुका है। उस तानाशाह से सारे विश्व के देशों की नींद हराम है। अमेरिका को सर्वाधिक खतरा है, जितनी सावधानी से उसने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित करने का ताना-बाना बुना था आज उतनी ही शीघ्रता से उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने की स्थिति में है। उसके पापकर्मों का फल देने के लिए ओसामा से भी भयंकर चेहरे के साथ उत्तरी कोरिया का एक ‘नवयुवक’ खड़ा हो गया है। अभी अमेरिका के पास ताकत है और जब तक ताकत रहती है तब तक बुद्घि की चौकी से विवेक गायब रहता है और वहां अहंकार बैठा रहता है, जो सही निर्णय नही लेने देता है, इसलिए अभी अमेरिका और उसके साथियों को हम और भी अधिक अहंकारी और हठीला बनते देखें तो कोई आश्चर्य नही होगा। उनका यह अहंकार और हठीला स्वरूप ही उन्हें तीसरे विश्वयुद्घ में निचोडक़र रख देगा। ब्रिटिश अभी भी भूल में है जबकि उनके पतन की कहानी द्वितीय विश्वयुद्घ से ही आरंभ हो गयी थी जिसने उसे अपने विश्वव्यापी साम्राज्य को समेटने के लिए विवश किया था। प्रकृति धीरे-धीरे क्षरण करती है पर हम यदि देखें तो कभी विश्व के बड़े भाग पर शासन करने वाला ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्घ के बाद बड़ी तेजी से ‘शक्तिहीन’ होता गया है। आज उसे अमेरिका का पिछलग्गू बनना पड़ गया है। वह जिस ऊंचाई पर 1945 में था उस पर आज नही है। यदि तीसरा विश्वयुद्घ घोषित होता है तो उसके पश्चात ब्रिटेन विनाश का ढेर भी बन सकता है। जो देश कभी विश्व के अधिकांश देशों को चूस रहा था, उसको अपने अपराधों का फल भी तो भोगना ही है।

जहां तक अमेरिका का प्रश्न है तो अमेरिका पहले और द्वितीय विश्वयुद्घ में मानवतावाद को मरवाने के लिए एक व्यापारी की हैसियत से दूर बैठकर हथियार बेचता रहा था। द्वितीय विश्वयुद्घ में परिस्थितियों के प्रवाह ने उसे युद्घ में धकेल दिया था और अंत में हिरोशिमा नागासाकी पर बमवर्षा करके लाखों लोगों को मारकर वह युद्घ के विजेता के रूप में उभरा।

जिसका परिणाम यह हुआ कि एक ‘अपराधी’ को विश्व ने अपना स्वामी मान लिया, या कहिए कि एक अपराधी विश्व का स्वामी होने का दम्भ भर बैठा। अब इस स्वामी के साथ प्रकृति का न्याय देखिए कि अब यह अपनी सही दिशा में जा रहा है, और हम देख रहे हैं कि अमेरिका को समय ने सूली पर चढ़ा लिया लगता है। जो दूसरों को कुंआ खोदता है उसके लिए ऐसा ही होता है। इस समय अमेरिका और उसके साथी देशों की सबसे बड़ी चिंता है कि परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ न जाने पायें। अमेरिका को अपने पिट्ठू पाकिस्तान से सबसे अधिक खतरा है जहां सेना और आतंकी एक साथ मिलकर चलते हैं, इसलिए इस देश से परमाणु बम आतंकियों के हाथों लग सकते हैं। यह कार्य कभी भी होना संभव है, और यदि ऐसा हो गया तो फिर क्या होगा? बस यही वह बिंदु है जहां आकर आतंकवाद से लड़ रहे अमेरिका और उसके साथियों सहित विश्व के अन्य देशों की भी सांस अटक जाती है।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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