आज का यक्ष प्रश्न

  • 2015-12-19 01:30:02.0
  • राकेश कुमार आर्य

महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को समझाते हुए कहते हैं-‘‘हे भारत! राजा को वेद और वेदांगों का विद्वान, बुद्घिमान, तपस्वी, सदा दानशील तथा यज्ञ परायण होना चाहिए।’’

यहां एक प्रकार से लोककल्याण के लिए तत्पर राजा के लिए भीष्म उसकी योग्यता का निर्धारण कर रहे हैं। वेद और वेदांगों का विद्वान, बुद्घिमान, तपस्वी, सदा दानशील और यज्ञ परायण राजा अपनी प्रजा के प्रति समस्त नैतिक नियमों और कत्र्तव्यों से स्वयं को भरा हुआ अनुभव करता है। ऐसा राजा ही लोकतांत्रिक शासक होता है, इसलिए उससे लोकतंत्र की रक्षा की पूरी अपेक्षा की जा सकती है। इस कथन से यह भी पता चलता है कि भारत के प्राचीन शासन प्रणाली पूर्णत: लोकतांत्रिक थी।

अब आते हैं तो अपने वर्तमान संविधान पर जो आज के किसी राजा या जनप्रतिनिधि के लिए किसी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता का निर्धारण नही करता। इसके अनुसार यदि राजा वेद वेदांगों का विद्वान न हो तो यह उसका परमगुण माना जाएगा-
क्योंकि ऐसे राजा से ही धर्मनिरपेक्षता की रक्षा संभव है।
इसी प्रकार उसका बुद्घिमान, तपस्वी, सदा दानशील और यज्ञ परायण न होना भी उसकी योग्यताएं मानी जाती हैं। हमारी प्राचीन राज्य प्रणाली राजा के लिए उच्च गुणों से संपन्न होने को उसकी अनिवार्य योग्यता मानती थी और आज की राज्यप्रणाली ऐसा नही मानती-कदाचित यही कारण है कि हमारे आज के जनप्रतिनिधियों के लिए हमारी प्राचीन राज्यप्रणाली हेय और त्याज्य वस्तु है, जबकि वे वर्तमान संविधान को अपने लिए सबसे अधिक उपयुक्त मानते हैं।
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भीष्म पितामह कहते हैं-‘युधिष्ठिर! राष्ट्र अथवा राष्ट्रवासी प्रजा का सबसे प्रथम कार्य यह है कि वह किसी योग्य राजा का अभिषेक करे, क्योंकि राजारहित राष्ट्र निर्बल होता है। उसे डाकू और लुटेरे लूटते और सताते हैं। (तब राज्य में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है) अराजक राष्ट्र में धर्म की स्थिति नही रहती, अत: वहां के लोग एक दूसरे को हड़पने लगते हैं। अराजक देश को सर्वथा धिक्कार है। मेरी रूचि तो यह है कि राजा से हीन देश में निवास नही करना चाहिए क्योंकि पापपूर्ण अराजकता से बढक़र कोई पाप नही है। अराजक राष्ट्र में दूसरे के धन का अपहरण करने वाला पापाचारी मनुष्य बड़ा प्रसन्न होता है, परंतु जब दूसरे लुटेरे उसका भी धन लूट लेते हैं, तब वह राजा की आवश्यकता अनुभव करता है। अराजक देश में पापी मनुष्य भी कभी कुशलता से नही रह सकते। एक का धन दो मिलकर उठा लेते हैं, और उन दोनों के धन को अन्य बहुत से मिलकर लुटेरे लूटकर ले जाते हैं।

अराजक राष्ट्र में जो दास नही है उसे दास बना लिया जाता है, स्त्रियों को बलपूर्वक हर लिया जाता है, अत: विद्वानों ने प्रजापालक नरेशों की सृष्टि की।’

वर्तमान में अपने भारत की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का यदि अनुशीलन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि सर्वत्र अराजकता का परिवेश बना हुआ है। कारण है कि ‘राजा’ का चुनाव करने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है, राजा की कोई योग्यता निर्धारित नही की गयी है और देश में राजनीतिक आचार संहिता का कोई प्राविधान नही किया गया है। यदि एक आदर्श राजनीतिक आचार संहिता का पालन करना देश के राजनीतिज्ञों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और यह बता दिया जाए कि राष्ट्रहित के अमुक-अमुक मुद्दों पर भी यदि किसी ने विपरीत सुर निकाले तो उसकी संसद या विधानमंडल की सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी तो देश में आजम खां से लेकर ओवैसी और शाहबुद्दीन से लेकर फारूख अब्दुल्ला तक कितने ही लोगों को जेलों की हवा खानी पड़ जाएगी। लेकिन वर्तमान राजनीति ‘भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर देश विरोधी और समाज विरोधी बयान देने वालों या समाज में अराजकता का वातावरण बनाने वालों की ही सुरक्षा में लगी दिखाई देती है। हमारा कहने का अभिप्राय है कि वर्तमान में समाज में लोगों की संपत्तियों पर अवैध कब्जा करने वाले भूमाफिया, नारी का शील हरण करने वाले व्यभिचारी, समाज में साम्प्रदायिकता का विष घोलकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले राजनीतिज्ञ केवल इसलिए खुले घूमते हैं कि उन पर लगाम लगाने वाली कोई राजनीतिक आचार संहिता देश में नही है।

जिस देश में राजनीति करने वालों के लिए यह एक अनिवार्य गुण माना जाता हो कि उसके साथ सौ पचास बदमाशों का रहना आवश्यक है, उस देश में अराजकता नही फैलेगी तो किस देश में फैलेगी?

राजनीति के वर्तमान निराशाजनक परिवेश पर थोड़ा चिंतन करने की आवश्यकता है। सवा अरब की जनसंख्या के देश के लिए कुल 543 जनप्रतिनिधि देश की लोकसभा में बैठते हैं। अब इनका आचरण देखिए, और इच्छाशक्ति का परीक्षण करिये। इनमें से जितने विपक्ष के सांसद हैं वे सभी देश चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की मानते हैं और कहते हैं कि-‘चलाओ देश! क्योंकि देश चलाने की जिम्मेदारी जनता ने तुम्हें दी है और हम चलने नही देंगे क्योंकि तुम्हें (वास्तव में देश को) रोकने की जिम्मेदारी देश की जनता ने हमें दी है।’ इस प्रकार लोकसभा का एक बड़ा वर्ग लोकसभा के भीतर ही अराजकता फैलाने वालों की श्रेणी में सम्मिलित हो जाता है। इनसे कौन पूछे कि तुम्हें यदि देश की जनता ने विपक्ष में बैठाया है तो एक तो तुम्हारे किये का दण्ड तुम्हें दिया है, कि तुम अच्छा कार्य नही कर रहे थे और दूसरे तुम्हें अब एक महान रचनात्मक भूमिका प्रदान की है कि विशेष पक्ष (विपक्ष) बनकर शासक दल की नीतियों की समीक्षा करो और यदि उसमें कुछ ऐसा है जो राष्ट्र के लिए उचित नही कहा जा सकता है तो उसे समाप्त कराओ और रचनात्मक सहयोग देकर देश में सुव्यवस्था और शांति स्थापित करो।

अब राजधानी दिल्ली पर आइए। यहां के ‘क्षत्रप’ केजरीवाल जी के पास पिछले कई दिनों से जनता का काम करने का समय नही है, क्योंकि महोदय इस बात पर रूष्ट हैं कि उनके एक भ्रष्ट अधिकारी को सी.बी.आई. ने क्यों पकड़ लिया? पलटवार करते हुए अब देश के वित्तमंत्री जेटली को फंसाने की तैयारी हो रही है तो भाजपा और सरकार दोनों मिलकर जेटली के पीछे खड़ी हो गयी हैं। देश की जनता के लिए सारी की सारी सरकार के पास ही समय नही है। सवा अरब लोगों की समस्याएं पिछले 4-5 दिन में कितनी बढ़ गयी होंगी? यह सोचने का समय भी किसी के पास नही है। 543 सांसदों में से जितने राजग के हैं उनमें भी इच्छाशक्ति का अभाव है और वह देश चलाने की जिम्मेदारी केवल सरकार और मंत्रियों की मानते हैं, अपना काम तो वह केवल शोर मचाना और समय आने पर सरकार के समर्थन में वोट डालना ही मानते हैं। सरकार में भी मंत्रियों की स्थिति अच्छी नही है, वह भी कुल मिलाकर मोदी पर निर्भर है, इस प्रकार एक मोदी मैदान में अकेले दीखते हैं, शेष सभी नकारात्मक और असहयोगात्मक राजनीति के निराशाजनक भावों से भरे हैं? जिस देश का संविधान देश के राजनीतिज्ञों की कोई योग्यता निर्धारित न करे और उनकी अयोग्यता को अयोग्यता कहने पर मौन हो, उस देश का राज कैसे चलेगा, और कैसे वह अपने आपको बचाएगा-यह आज का यक्ष प्रश्न है?

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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