एक विस्मृत हिन्दू सम्राट - महाराजा हेमचन्द्र विक्रमादित्य

  • 2014-10-05 04:53:15.0
  • उगता भारत ब्यूरो

unnamed-विनोद बंसल

सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य, भारतीय इतिहास के उन चुनिन्दा लोगों में से हैं जिन्होंने इतिहास की धारा मोड़कर रख दी। वे पृथ्वीराज चैहान (1179-1192) के बाद इस्लामी शासनकाल के मध्य दिल्ली के सम्भवतः एकमात्र हिन्दू सम्राट हुए जो विद्युत की भांति चमके और दैदीप्यमान हुए। उन्होंने अलवर (राजस्थान) के बिल्कुल साधारण से घर में जन्म लेकर एक व्यापारी, माप-तौल अधिकारी, ‘दरोगा-ए-डाल चौकी’, ’वजीर’ (प्रधानमंत्री) और सेनापति होते हुए दिल्ली के तख्त पर राज किया और अपने अपार पराक्रम एवं 22 युद्धों में विजयी रहकर ’विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। यह वह समय था जब मुगल एवं अफगान- दोनों ही दिल्ली पर राज्य के लिए संघर्षरत थे। यद्यपि हेमचन्द्र अधिक समय तक शासन न कर सके, तथापि इसे भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना अवश्य कहा जायेगा। हेमचन्द की तूफानी विजयों के कारण कई इतिहासकारों ने उनको ’मध्यकालीन भारत का नेपोलियन’ कहा है।



जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन -

हेमचन्द्र, राय जयपाल के पौत्र और राय पूरणदास (लाला पूरणमल) के पुत्र थे। इनका जन्म आश्विन शुक्ल विजयादशमी, मंगलवार, कलियुगाब्द 4603, वि.सं. 1556, 02 अक्टूबर, 1501 ई. को अलवर (राजस्थान) जिले के मछेरी नामक गांव में हुआ था। इनके पिता पहले पौरोहित्य कार्य करते थे, किन्तु बाद में मुगलों के द्वारा पुरोहितों को परेशान करने के कारण कुतुबपुर, रेवाड़ी में आकर नमक का व्यवसाय करने लगे।

हेमचन्द्र की शिक्षा रेवाड़ी में आरम्भ हुई। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, फारसी, अरबी तथा गणित के अतिरिक्त घुड़सवारी में भी महारत हासिल की। साथ ही पिता के नये व्यवसाय में अपना योगदान देना शुरू कर दिया। अल्पायु से ही हेमचन्द्र, शेरशाह सूरी (1540-1545) के लश्कर को अनाज एवं बन्दूक चलाने में प्रयोग होने वाले प्रमुख तत्व पोटेशियम नाइट्रेट अर्थात शोरा उपलब्ध कराने के व्यवसाय में पिताजी के साथ हो लिए थे। इसी बारूद के प्रयोग के बल पर शेरशाह सूरी ने हुमायूं (1531-1540 एवं 1555-1556) को 17 मई, 1540 ई. को कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में हराकर काबुल लौट जाने पर विवश कर दिया था। हेमचन्द्र ने उसी समय रेवाड़ी में धातु से विभिन्न तरह के हथियार बनाने के काम की नींव रखी, जो आज भी वहां पीतल, तांबा, इस्पात के बर्तन आदि बनाने के काम के रूप में जारी है।



दिनांक 22 मई, 1545 ई. को शेरशाह सूरी की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र जलाल खां ने इस्लामशाह सूरी के नाम से गद्दी सम्भाली और 1545 से 1554 तक दिल्ली पर शासन किया। पंजाब से बंगाल तक फैले हुए राज्य में अनके अफगान- सरदारों ने मौके का लाभ उठाकर बगावत करनी चाही, लेकिन इस्लामशाह ने सबको पराजित कर दिया। इस्लामशाह ने एक प्रतिष्ठित व्यापारी की सिफारिश पर हेमचन्द्र को दिल्ली का बाजार- अधीक्षक बनाया और बाद में उन्हें खाद्य एवं आपूर्ति विभाग का अधीक्षक तथा ’दरोगा-ए-डाक चौकी’ के महत्वपूर्ण पद पर आसीन कर दिया। सैन्य गतिविधियों, प्रशासन और जनसामान्य के बीच एक अविच्छिन्न सम्पर्क-सेतु बनाकर वह आम नागरिक से लेकर सुल्तान तक ही प्रशंसा के पात्र बन गये। अनेक अफगान-सरदारों की अनिच्छा के बावजूद इस्लामशाह ने हेमचन्द्र को छः हजार सवारों की मुख्तियारी दी और ’अमीर’ का खिताब दिया।



दिनांक 22 नवम्बर, 1554 को ग्वालियर में अपनी मृत्य के पूर्व इस्लामशाह ने पंजाब से हेमचन्द्र को बुलाकर उनको दिल्ली की सैनिक और प्रशासनिक व्यवस्था सौंप दीं इस्लामशाह की मृत्यु के बाद उसका बारह वर्षीय पुत्र फिरोजशाह सूरी गद्दी पर बैठा, किन्तु वह कुछ ही महीने शासन कर सका। 1554 में ही उसे शेरशाह के भतीजे मुहम्मद मुबारिज खान ने मौत के घाट उतार दिया और स्वयं आदिलशाह सूरी के नाम से 1554 से 1555 तक शासन किया। आदिलशाह एक घोर विलासी और लम्पट शासक था और शासन की बिल्कुल भी परवाह नहीं करता था। फलस्वरूप अनेक अफगान-अधिकारियों ने उसके विरूद्ध बगावत शुरू कर दी। विद्रोह को दबाने और राजस्व वसूली के लिए आदिलशाह ने हेमचन्द्र को ग्वालियर के किले मे न केवल अपना ’वजीर’ (प्रधानमंत्री) बनाया, वरन अफगान सेना का सेनापति भी नियुक्त कर दिया। इस प्रकार हेमचन्द्र पर शासन का भार डालकर आदिलशाह ने चुनार (मिर्जापुर के पास) की राह पकड़ी। इस प्रकार सम्पूर्ण अफगान शासन हेमचन्द्र के हाथ में आ गया। अवसर पाकर हेमचन्द्र ने हिन्दू राज्य का स्वप्न देखा।



हुमायूं, जो पहले 1540 ई. में शेरशाह सूरी द्वारा हराकर काबुल खदेड़ दिया गया था, ने दुबारा हमला करके शेरशाह सूरी के भाई सिकन्दर सूरी को पंजाब से हराकर जुलाई, 1555 ई. में दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उस समय अफगान- सरदार आपस में ही संघर्षरत थे। उत्तर भारत, मध्य भारत, बिहार और बंगाल तक उन्होंने अपने झण्डे बुलंद कर दिए। आदिलशाह के सबसे बड़े शत्रु इब्राहीम खान ने कालपी में सिर उठा लिया था। तब आदिलशाह ने हेमचंद्र को बड़ी सेना और पाँच सौ हाथी तथा तोपखाना देकर आगरा और दिल्ली के लिये भेजा। जब हेमचंद्र काल्पी पहुँचे, तब उन्होंने निश्चय कर लिया कि पहले इब्राहीम को समाप्त किया जाए। इसलिए उन्होंने शीघ्रता से उसकी ओर कूच किया। एक बहुत बड़ी लड़ाई हुई, जिसमें हेमचंद्र विजयी हुए और इब्राहीम भागकर बयाना चला गया। हेमचंद्र ने उनका पीछा किया और बयाना को घेर लिया। यह घेरा तीन महीने तक चलता गया। तभी हेमचंद्र को आदिलशाह का आदेश प्राप्त हुआ कि बंगाल के सूबेदार मुहम्मद ख़ान गोरिया (1545-1555) ने विद्रोह कर दिया है। तब हेमचंद्र ने बंगाल की ओर कूच किया और आगरा से 15 कोस की दूरी पर छप्परघाट नामक गांव के निकट मुहम्मद ख़ान गोरिया से लड़ा जिसमें मुहम्मद मारा गया। इसके बाद हेमचंद्र ने बंगाल में अपने सूबेदार शाहबाज़ ख़ान को नियुक्त किया। इसके 6 माह बाद दिल्ली में हुमायूं की मौत   ( 27 जनवरी 1556) का समाचार सुनकर समझ लिया कि अब हिंदू राज्य के स्वप्न को साकार किया जा सकता है।



हेमचंद्र ने मुगल साम्राज्य को उखाड़ फ़ेंकने के लिये दिल्ली की ओर कूंच किया और ग्वालियर से निकलकर बंगाल, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व अगरा की कई रियासतों को जीतते हुए, 22 युद्ध लड़े।

 

दिल्ली पर विजय व राज्यारोहण           

6 अक्टूबर 1556 को हेमचंद्र ने अपने स्भी सेना अधिकारियों, अनेक पठान योद्धाओं, 40 हज़ार घुड़सवारों, 51 बड़ी तोपों और 500 छोटी तोपों के साथ दिल्ली के कुतुब मीनार से सेंकेंड मील दूर तुगलकाबाद में अपना डेरा जमाया। दिल्ली के सूबेदार तारदीबेग ख़ान ने उनका मुकाबला करने का असफ़ल प्रयास किया किंतु उसे अपने लगभग 3 हज़ार मुगल सैनिकों, अपार धन संपत्ति, 1 हज़ार अरबी घोड़े तथा लगभग 15 सौ हाथियों से हाथ धोना पड़ा और स्वयं जान बचाकर भागना पड़ा। अगले ही दिन दिनांकित अक्टूबर 1556 को दिल्ली के पुराने किले में अफ़गान और हिंदू सेना नायकों के सानिद्ध्य में पूर्ण हिंदू धार्मिक विधि से उनका राज्याभिषेक हुआ और उन्हें विक्रमादित्य की उपाधि से विभूषित किया गया। 364 वर्षों के मुगल शासन में पहली बार किसी हिंदू शासक ने गद्दी संभाली थी।



हुमायूं की मृत्यु के पश्चात् उसके 14 वर्षीय पुत्र अकबर (1556-1605) को उसके कई सेनापतियों व संरक्षक बैरम ख़ान ने हेमचंद्र से युद्ध करने के लिए अकबर को प्रेरित किया। 5 नवंबर 1556 को पानीपत में हुए इस युद्ध में अकबर और बैरम ख़ान ने स्वयं युद्ध में भाग नहीं लिया और युद्ध क्षेत्र से सेंचुरी किलोमीटर दूर सौंधापुर गांव स्थित शिविर में ही रहे जबकि हेमचंद्र ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व किया। एक ओर हेमचंद्र की सेना में कुल कुलचिह्न लाख सैनिक 1500 सुरक्षा कवच धारी हाथी योद्धा व धनुर्धर थे तो वहीं दूसरी ओर मुगल सेना में कुल 20 हज़ार अश्वारोही सैनिक ही थे। अकबर की सैन्य टुकड़ी की कूट नीतिक चालों ने एक बार तो हेमचंद्र के सैनिकों को तोपें छोड़ मैदान से भागने पर विवश कर दिया किंतु जब हेमचंद्र जब स्वयं हाथियों के साथ आगे बढ़े तो मुगल सेना का बायां पक्ष हिल उठा था। “हवाई” नामक एक विशाल हाथी पर सवार होकर सैन्य संचालन कर रहे हेमचंद्र ने ताबड़तोड़ तीरों की जो बौछार की उससे मुगल सेना भयभीत हो चुकी थी। इसी बीच वे भी शत्रुओं के तीरों से घायल तो थे किंतु सहसा एक तीर उनकी आंखों को चीरता हुआ मस्तिष्क में घुस गया और वे मूर्छित होकर हौदे में गिर पड़े। हेमचंद्र के गिरने की सूचना मात्र से उनके सैनिक बुरी तरह भयभीत होकर युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए और अकबर को बैठे बिठाए निर्णायक सफ़लता प्राप्त हो गई। बाद में उनके मृत प्रायः शरीर को शाह कुली ख़ान अनेक सैनिकों के साथ अकबर के समक्ष ले जाया गया जहाँ स्वयं बैरम ख़ान ने अकबर के ही समक्ष उनके टुकड़े- टुकड़े कर सिर को काबुल में और धड़ को दिल्ली में बेरहमी से दरवाज़ों पर लटकाया गया। इतना ही नहीं दोबारा कोई विद्रोह न कर सके इसलिए अकबर ने हेमचंद्र के सैनिकों और शुभचिंतकों के हज़ारों कटे सिरों का बुर्ज बनाया गया, उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा कर उनके पिता राय पूरणदास के भी टुकड़े- टुकड़े कर डाले और उनका कुल नष्ट करने के लिए अलवर, रेवाड़ी, नारनौल, आनौड़ आदि क्षेत्रों में बसे हुए उनके सहयोगियों को चुन-चुनकर बंदी बनाया गया। अनेक इतिहास विदों, समाजसेवियों ने हेमचंद्र विक्रमादित्य की महान राष्ट्र भक्ति, कुशल सैन्य संचालन का गुणगान करते हुए लिखा है कि चाहे उन्होंने मात्र एक महीने ही राज किया हो किंतु जितना प्रभावशाली वक्तित्व उनका था वह भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। संयोगवश उनकी और उनके हाथी की आँख में तीर लग जाने से अकबर की लौट्री लग गई।



मध्यकालीन और आधुनिक इतिहासकारों ने हेमचंद्र विक्रमादित्य के प्रति न्याय नहीं किया तथा युद्धक्षेत्र की एक दुर्घटना ने उनकी विजय को पराजय में बदल दिया अन्यथा संभवतः युद्ध का परिणाम दिल्ली में मुगलिया सल्तनत स्थापित करने की बजाय संपूर्ण भारत में हिंदू साम्राज्य की आधारशिला के रूप में स्थापित होता। आओ! भारत के इस गौरवशाली वीर सपूत को उनकी जयंती 5 अक्टूबर पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर याद करें तथा नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय सभागर में सायं 3 बजे अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा आयोजित की गई गोष्ठी “एक विस्मृत हिंदू सम्राट महाराजा हेमचंद्र विक्रमादित्य को स्मरणांजलि” में भाग लें।

उगता भारत ब्यूरो ( 2474 )

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