30/05/2013

  • 2013-05-30 02:46:52.0
  • डॉ. दीपक आचार्य

संबंधों में माधुर्य भरी सफलता चाहें तो सतत संवाद के प्रति गंभीर रहें

- डॉ. दीपक आचार्य
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दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ ही है संवादहीनता। सामाजिक जिन्दगी का पर्याय माने जाने वाले मनुष्य के लिए व्यष्टि और समष्टि के साथ संबंधों की अनिवार्यता जरूरी है। इसके बगैर न मनुष्य अपने लक्ष्यों और जीवन में सफल हो सकता है और न ही परिवेश और समुदाय।
यह संबंध ही ऐसा है जो परस्पर एक-दूसरे पर पूरी प्रगाढ़ता के साथ निर्भर है। जो लोग हमारे अपने स्तर के अनुरूप नहीं हैं अथवा जिनमें मानवीय गुणों और मूल्यों का अभाव है उन लोगों को भी कुछ मौके ऐसे देने चाहिएं कि वे संबंधों की अहमियत और मनुष्य योनि प्राप्त होने के महत्त्व को समझ सकें।
इसके बावजूद वे रिश्तों के महत्त्व को न समझ पाएं तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि उनके दुर्भाग्य की लकीरें गहरी होती जा रही हैं और वे आपके साथ संबंधों का अनुकूल स्तर धारण नहीं करते हैं
ऐसे लोगों में अभी कहीं न कहीं कोई कमी, अवगुण या खोट है और इस कारण से संवादहीनता और संपर्कहीनता बनी हुई है।
ऐसे लोगों पर अपनी ओर से ज्यादा मेहनत न करें बल्कि उन्हें इनके समान विचारधाराओं और षड़यंत्रों से ही पेट भरने का प्रयत्न करने वाले ईष्ट मित्रों के कबीलों में ही रहने दें ताकि वे इन्हीं में रमे रहें।
हालांकि ऐसे लोगों की सं या ज्यादा नहीं हुआ करती क्योंकि अच्छे लोगों के अच्छे कर्मों को देखते हुए ईश्वर स्वयं भी ऐसे कमीन, नालायक और विघ्नसंतोषियों से हमें दूर ही रखता है। दो-चार ऐसे खुराफाती हमारे संपर्क में आ भी जाएं तो उन्हें शत्रु नहीं मानकर मूर्ख या विदूषक मानें और उनके मजे लेते हुए यह मानें कि भगवान ने हमारे लिए मनोरंजन की व्यवस्था भी कर रखी है।
संबंधों के प्रति आत्मीयता से भरपूर तथा अपने किसी भी कर्म या रिश्तों से जुड़े हुए जो लोग हमारे संपर्क में हैं उनके साथ हमारा संवाद सातत्य निरन्तर जारी रहना चाहिए। इससे संबंधों में माधुर्य आता है और हमारे जीवन के काम-काज और अधिक सहज, सरल एवं आनंददायी अनुभव होते हैं। इससे अपने कर्म की गुणवत्ता भी उच्चतम स्तर को प्राप्त होती है और उपयोगिता का ग्राफ बहुत विस्तार तथा ऊँचाइयां पा जाता है।
इस संवाद सातत्य के लिए जरूरी है कि पारस्परिक संवाद के तमाम विकल्प खुले रखें और इससे जुड़े हुए हर उपलब्ध संसाधन का भरपूर प्रयोग करें। इस मामले में रि$जर्व नहीं रहना चाहिए।
अब हालांकि पत्र लेखन का समय नहीं है लेकिन टेलीफोन, मोबाइल, ईमेल, चेटिंग, एसएमएस, एमएमएस आदि कई अत्याधुनिक साधन-सुविधाएं उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से पल भर में दुनिया का हालचाल जाना जा सकता है। फिर अपने लोग इस सुविधा से वंचित क्यों रहें।
जीवन में यदि संवादों की निरन्तरता क्रम बना रहे तो हम कई समस्याओं और तनावों से मुक्ति पा सकते हैं। इससे हमारे मन-मस्तिष्क का बोझ हलका होता है और यह ताजगी के साथ जीवनीशक्ति का अहसास कराता है।
जो पत्र हमारे पास रोजाना आएं, उनका तत्काल प्रत्युत्तर देने का प्रयास करें फिर चाहे ये पत्र कार्यालयी हों या व्यक्तिगत। इससे रोजाना का बोझ नहीं रहता है और दिमाग स्वस्थ एवं तरोताजा बना रहता है। अन्यथा हर रोज ऐसे पत्र हमारे दिमाग में अपना स्थान बनाते रहते हैं जिनका हमें जवाब देना होता है और यह काम रोजाना बढ़ता चला जाता है। अन्तत: यही हमारे तनावों और दु:खों का कारण बन जाता है।
यही बात फेक्स, ईमेल, एसएमएस पर भी लागू होती है। वही व्यक्ति सर्वाधिक सफल होता है जो अपने पास आए पत्रों या संदेश का जवाब तत्काल अथवा जल्द से जल्द दे डालता है। ऐसे लोगों की छवि ही बेहतर एवं शुभ्र प्रतिष्ठा प्राप्त कर पाती है जिसमें आदर भी है और दिली स मान भी।
पक्का प्रयास यह करें कि हमारे पास कोई ऐसा काम रहे ही नहीं जिससे कुलबुलाहट और अकुलाहट बनी रहे। जो भी कोई हमसे जो जानकारी पाना चाहता है उसे इस बात का संतोष होना चाहिए कि समाज में आज भी ऐसे लोगों का वजूद बना हुआ है जो यथासंभव जल्द से जल्द प्रत्युत्तर देने का माद्दा रखते हैं।
संवादों का त्वरित आदान-प्रदान हमें कई समस्याओं से छुटकारा दिलाने का ब्रह्मास्त्र भी है। इसलिए जीवन से तनावों को अलविदा कहना चाहें तो संवादों के प्रति गंभीर रहें और संवेदनाओं के साथ काम करें।

डॉ. दीपक आचार्य ( 386 )

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