1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वातंत्रय समर सिद्घ करने वाले सावरकर

  • 2015-10-26 02:30:38.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जिस क्रांतिपुंज वीर सावरकर की बात हम कर रहे हैं उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के ग्राम भगूर में चितपावन वंशीय ब्राह्मण श्री दामोदर सावरकर के घर हुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई था। माता-पिता दोनों ही भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पित थे, विचारों से दोनों ही हिंदुत्वाभिमानी और धार्मिक वृत्ति के थे। पिता अपने पुत्र को अपनी संस्कृति के प्रति समर्पित करने के उद्देश्य से बचपन से ही महापुरूषों के जीवनवृत्त सुनाया करते थे। रामायण और महाभारत की कथा बालक विनायक दामोदर सावरकर को बचपन में ही कंठस्थ करा दी गयी थी। मां राधाबाई की स्थिति भी ऐसी ही थी। वह भी अपने वैदुष्य को अपने बालक के सुकोमल मन में पूर्णत: उंडेल देने का प्रयास करती थीं। अपनी हर संतान का पालन पोषण दोनों पति पत्नी ने इसी प्रकार किया था। मां अपने पुत्र विनायक को वैसे ही संस्कारित करती थीं जैसे माता जीजाबाई शिवाजी को किया करती थी। बालक विनायक दामोदर सावरकर भी अक्सर कह दिया करता था-‘‘मां मैं बड़ा होकर शिवाजी बनूंगा।’’ तब मां को बड़ी प्रसन्नता मिलती थी। प्रसन्नता से मां अपने बच्चे का चुम्बन ले लेती। मुख चूमती, सिर पर हाथ फेरती।1336760845_Veer-Savarkar


जब बालक विनायक दस वर्ष का ही था तभी माता राधाबाई का देहांत हो गया। पर संसार से जाने से पूर्व मां इस पुत्र को इतना कुछ दे गयी थी कि उस दिये हुए को विनायक आजीवन समाप्त नही कर पाया। मां के जाने के पश्चात बालक विनायक अपने देश की स्वाधीनता के सपने लेने लगा। वह हिंदी स्वराज्य के लिए संघर्ष करने की बात सोचता और उसी की योजनाओं में डूूबा रहता। विनायक ने पांचवीं तक की शिक्षा अपने गांव में प्राप्त की और उससे आगे  की शिक्षा के लिए उसे नासिक भेज दिया गया। बालक विनायक अब युवा होता जा रहा था। ज्यों ज्यों वह बड़ा हो रहा था त्यों-त्यों उसके भीतर का ‘तात्या’ (उनका अपना घरेलू नाम था) मचलता और उसे हिंदवी स्वराज्य के लिए कुछ करने को प्रेरित करता। उससे प्रश्न पूछता कि मां को जो वचन दिये गये थे, वे अंतत: पूर्ण कब और कैसे किये जाएंगे? भागते हुए समय को देखकर विनायक यथाशीघ्र कुछ करने के संकल्पों से भर जाता था।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उन दिनों ‘केसरी’ का संपादन कर रहे थे। उनके इस पत्र की उस समय के युवाओं और क्रांतिकारियों में अच्छी धूम मची थी। उनके लेख बड़े ओजस्वी होते थे और वह  उस समय युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुके थे। विनायक ने अपने इस नायक लोकमान्य के ‘केसरी’ को पढऩा आरंभ किया और ‘हिंद केसरी’ बनने के मार्ग पर आरूढ़ हो गया। अपने साथियों के साथ मां दुर्गा के सामने प्रतिज्ञा ली कि-‘‘मैं देश की स्वाधीनता के लिए जीवन के अंतिम क्षणों तक सशस्त्र क्रांति के माध्यम से जूझता रहूंगा।’’

इसी युवा ने जिस संकल्प के साथ देश भक्ति के कंटकाकीर्ण मार्ग का अनुगमन किया उसी पर चलते हुए जीवन व्यतीत किया और संसार से जाने से पूर्व अंतिम वसीयत में बड़े गर्व के साथ लिखा:-

‘‘मेरा वंश संपूर्ण मानवजाति की सेवा में समर्पित रहा है। मैंने अपने संकल्प के अनुसार प्रत्येक दिवस के कार्य को किये बिना सूर्य को अस्त नही होने दिया। अपने समस्त कत्र्तव्यों की पूर्ति की चेष्टा मैंने भरसक की है। अपने कृतकार्यों से मेरा जीवन संपन्न बना है। धार्मिक, सामाजिक कोशिश कत्र्तव्यों का पालन मैंने पूर्ण मनोयोग से किया है। मृत्यु के पश्चात होने वाली अवस्था में सुयोग्य निवास पाने के लिए मैंने अपने कर्मों से ही अग्रिम किराया चुका रखा है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं मृत्यु उपरांत अपने कर्मों के बल पर एक अच्छी सी कोठी प्राप्त करूंगा।’’

अपनी प्रतिज्ञा पर आजीवन प्रसन्नता व्यक्त करने वाले वीर सावरकर ने अपने भाई को अंडमान से एक पत्र लिखा-‘‘संकटों को झेलने में ही हम सबकी कत्र्तव्यनिष्ठा समाविष्ट है। यशापयश केवल योगा-योग की ही बात है। जीवन भर युद्घ करते-करते आस्टे्रलीट्ज को जीतकर भी नैपोलियन बिछौने पर चल बसता है। इसी प्रकार स्वातंत्र्य युद्घ में महारानी लक्ष्मीबाई तलवार के एक घाव से स्वर्ग सिधार जाती है।’’

जैसा जिसका चिंतन होता है, जैसा जिसका संकल्प होता है व्यक्ति वैसा ही बन जाता है। हम कैसे हैं या कैसे होंगे इसे नापने के लिए बाहर किसी से जाकर पूछने  की आवश्यकता नही है। हम वैसे ही हैं, और वैसे ही होंगे जैसे लोगों को हम अपना आदर्श मानते हैं। क्योंकि ये आदर्श हमारे भाव जगत को भाव जगत विचार जगत को और विचार जगत कार्य जगत को बड़ी गंभीरता से प्रभावित करता है। कार्यजगत अंत में लोगों के मानस में जाकर हमारे विषय में उनके भीतर पुन: भावजगत और विचार जगत का निर्माण करता है। तब वह हमारे विषय में कुछ कहते या लिखते हैं। उनके कहने या लिखने में देर हो सकती है, पर हमारे अंतर्मन पर लिखे हमारे आदर्शों को पढऩे में हमें देर नही हो सकती। उन्हें पढ़ो और अपने विषय में अपना भविष्यफल स्वयं निकाल लो।

विनायक ने अपना भविष्यफल उसी दिन निकाल लिया था, जिस दिन उसने अपनी माता राधाबाई को यह वचन दिया था कि वह शिवाजी बनेगा। मानो उस दिन से शिवाजी उनके आदर्श बन गये। शिवाजी को आदर्श बनाने का अर्थ ही यह था कि स्वयं को संकटों के लिए तैयार कर लेना। मां भारती को पराधीनता की बेडिय़ों से मुक्त करने हेतु देश में क्रांति का साज सजाना।

विनायक ने अपने कुछ उत्साही साथियों का चयन किया और ‘मित्र मेला’ संस्था के तत्वावधान में ‘गणेशोत्सव’ ‘शिवाजी महोत्सव’ आदि कार्यक्रम आयोजित करके युवकों में स्वाधीनता के प्रति चेतना का भाव उत्पन्न करने का कार्य आरंभ किया।

क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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