1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वातंत्रय समर सिद्घ करने वाले सावरकर-भाग-3

  • 2015-10-28 03:00:59.0
  • राकेश कुमार आर्य

220px-V_D_SAVARKAR‘इंडिया हाउस’ हमारे इस क्रांति नायक-महानायक और स्वाधीनता के विधायक-विनायक के कई महान कृतित्वों का साक्षी बना। इसी हाउस में रहते उन्होंने इटली के महान देशभक्त मेजिनी का जीवन चरित लिखा था। यहीं रहकर ‘सिखों का इतिहास’ नामक ग्रंथ लिखा। यहीं रहते उन्होंने पहले तो 1857 की क्रांति से संबंधित अभिलेखों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया और फिर ‘1857 का प्रथम स्वातंत्र्य समर’ नामक अपने महान गं्रथ की रचना की। यह 1907 की बात है। उस समय हमारे देश में 1857 की क्रांति के पचास वर्ष पूर्ण होने पर लोग उसके अद्र्घशताब्दी समारोहों का आयोजन कर रहे थे। लेागों में अपने देशभक्तों और क्रांति कारियों के प्रति बड़ा उत्साह था। उस समय सावरकर जी का यह ग्र्रंथ गरम लोहे पर चोट मारने वाला सिद्घ हुआ। सावरकर जी बड़े उत्साही क्रांतिकारी युवा थे। उन्होंने अंग्रेजों के घर लंदन में ही अपनी 1857 की क्रांति का अद्र्घशताब्दी मनाने की तैयारियां आरंभ कर दीं। 10 मई 1907 को ‘इंडिया हाउस’ को दुल्हन की भांति सजाया गया था। अपने देश के स्वातंत्र्य समर में भाग लेने वाले हमारे अनेकों क्रांतिकारियों ने इस गौरवप्रद समारोह में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की। भवन में मानो लघु भारत की उपस्थिति हो गयी थी। सर्वत्र गर्व गौरव की सौरभ बिखरी पड़ी थी। स्वाधीनता के उत्साह के इत्र की सुगंधि  से सारा वातावरण सुगंधित हो रहा था। जिसके वैभव में मंगल पाण्डे, लक्ष्मीबाई, वीर कुंवर सिंह, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, नानाजी पेशवा आदि के चित्र और भी अधिक वृद्घि कर रहे थे। भारतीय युवक 1857 के वीर अमर रहें के बिल्ले अपनी भुजाओं पर लगाकर घूम रहे थे या कार्यक्रम में आ रहे थे।

इसी कार्यक्रम में महानायक विनायक ने जब अपना संबोधन प्रारंभ किया तो ‘इंडिया हाउस’ भी अपने भाग्य को सराहने लगा था। क्योंकि आज पहली बार एक ऐसा वक्ता वह देख रहा था जो वक्ता कम और व्याख्याता अधिक था। सावरकर जी ने सप्रमाण सिद्घ किया कि 1857 की क्रांति को केवल ‘गदर’ नही कहा जा सकता। यह क्रांति सुनियोजित थी और भारत की स्वाधीनता का प्रथम समर था।

यहां कुछ युवा ऐसे भी आये थे जो ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों के छात्र थे। वे जब यहां से अपनी बांहों पर हमारे देशभक्त शहीदों के नाम या चित्र के बिल्ले लगाकर अपनी कक्षाओं में गये तो उनके अध्यापक उनके इस कृत्य पर अत्यंत क्रोधित हुए। पर उन्होंने उनके इस क्रोध की तनिक भी चिंता नही की। सावरकर जी के इस कार्यक्रम ने और उसमें दिये गये उनके भाषण ने संपूर्ण इंगलैंड को हिलाकर रख दिया था। क्रांति की इतनी बड़ी वकालत और वह भी शत्रु के घर में वस्तुत: आज से पूर्व कभी नही की गयी थी। इसलिए अब सावरकर कोई साधारण सावरकर नही रह गये थे अब तो वह अंग्रेजों की दृष्टिï में आ गये थे।

सावरकर जिस मिट्टी के बने थे उसमें कहीं रूक जाना तो लिखा ही नही था। इसलिए क्रांति के गुणगायक ने अब क्रांति पथ का निर्माण करने का निर्णय लिया। उन्होंने बम बनाने की विधि का अध्ययन किया। बापट और साथी हेमचंद दास को इस कार्य के लिए उन्होंने पेरिस भेजा। जिन्होंने बम मैनुअल की प्रतियां तैयार कीं और वे प्रतियां भारत में भी भेजी गयीं। इन प्रतियों को देखकर लोकमान्य तिलक की आंखों में आंसू आ गये थे। उन्हें लगा कि सावरकर को खोजकर उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा रत्न पा लिया था। अपने क्षेत्र में तिलक यदि गुरू बिरजानंद थे, तो सावरकर आज दयानंद सिद्घ हो गये थे। समाप्त