1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वातंत्रय समर सिद्घ करने वाले सावरकर-भाग-2

  • 2015-10-27 02:19:03.0
  • राकेश कुमार आर्य

savarkar1उन्ही दिनों (जब वह 18 वर्ष के थे) तो 22 जनवरी 1901 को महारानी विक्टोरिया का निधन हो गया। जिस पर देश में कांग्रेस के  ‘राजभक्तों’ ने स्थान स्थान पर शोकसभाएं आयोजित कीं। परंतु राष्ट्रभक्त विनायक दामोदर सावरकर और उनके साथियों ने ‘मित्र मेला’ की बैठक के द्वारा स्पष्ट निर्णय लिया कि इंगलैंड की रानी हमारे शत्रु देश की रानी है। अत: हम शोक क्यों मनायें?’’

उनके ऐसे विचारों को उनकी अंतश्चेतना सदा धारदार बनाती रही। ‘अभिनव भारत’ के विसर्जन समारोह में भाषण देते हुए कहते हैं-‘‘अपने देश की रक्षा व कल्याण के लिए क्रांतिकारी शूरवीर कष्ट उठाते हैं। अब देश की आजादी की रक्षा के लिए किसी भूमिगत क्रांतिकारी संगठन की आवश्यकता नही है। अब राष्ट्र का निर्माण गोली से नही, मतपत्र के ही अपेक्षित है। किंतु आजादी की रक्षा के लिए सशक्त की महती आवश्यकता है। हमारे वैदिक सनातन धर्म में अहिंसा को मूल रूप में ग्रहण करने का कोई संकेत नही।’’

‘1857 का भारतीय स्वातंत्रय समर’ में वह कहते हैं :-‘‘स्वराज्य की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है समरभूमि में शत्रु दलन। स्वतंत्रता की देवी भीख मांगने से नही, शीश-दान से रिझायी जाती है।  1857 में इस ऐतिहासिक तथ्य का प्रत्येक स्वातंत्र्य वीर ने साक्षात्कार कर लिया था। अत: चारों ओर एक ही नाद गूंज रहा था-युद्घाय पूज्यसव।’’

जब आप पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज में इंटरमीडिएट में पढ़ रहे थे तो वहीं से क्रांतिकारी, गतिविधियों को बढ़ाने में सम्मिलित होने लगे थे। उन्होंने विभिन्न समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में लेख व कविताएं प्रकाशित करानी आरंभ कीं जो कि देश भक्ति पर आधारित होती थीं। उनका इस प्रकार के लेखन का मूल उद्देश्य देश के युवा को अपने देश में क्रांति के माध्यम से स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त करने के लिए प्रोत्साहित करना होता था। उनके लेखों को ‘काल’ के संपादक श्री परांजपेे ने प्रकाशित करना आरंभ किया था। इस प्रकार देश धर्म के एक महान नक्षत्र को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का उचित मंच एवं माध्यम उपलब्ध हो गया। इन्हीं परांजपे महोदय ने ही सावरकर का परिचय लोकमान्य बालगंगाधर तिलक से कराया था। इन्हीं तिलक जी के विषय में उनहोंने अमरावती में भाषण देते समय कहा था-‘‘यह बात सही है कि महात्मा तिलक कांग्रेस में थे। लेकिन यह भी सही है कि महात्मा तिलक की कांग्रेस ने किसी पंथ, जाति या सम्प्रदाय या पक्ष के साथ पक्षपात का बर्ताव नही किया, उसे वेटेज नही दिया गया था और न ही देशभक्ति को बाजारू रूप दिया गया था। बिना अहिंसा के राज्य क्रांति अशक्त है-इस पगली भाषा का उच्चारण तक उन दिनों किसी ने नही किया था। महात्मा तिलक कांग्रेस में थे और मैंने महात्मा तिलक से देशभक्ति की शिक्षा ली थी और उन्हीं की शिक्षा-दीक्षा पर मैं आज तक चल रहा हूं, मुझे विश्वास है कि उनके सिद्घांतों से मैंने कभी विश्वास घात नही किया। मैं हमेशा यही कहता आया हूं कि राष्ट्र कार्य या राजनीति में किसी प्रकार का पक्षपातपूर्ण व्यवहार नही होना चाहिए। हिंदू महासभा की तो यह नीति ही रही है कि धर्मपंथ या पक्ष के साथ पक्षपात का बरताव न किया जाए। यदि इस वास्तविक रूप में और सच्चे मार्ग से कांग्रेस चलेगी तो मैं भी नही खुशी के साथ उसमें सम्मिलित हो जाऊंगा।’’

जब सावरकर जी बी.ए. के छात्र थे, तब उन्होंने 1905 में विदेशी वस्त्रों की होली के दहन का कार्यक्रम किया। पुणे के बीच बाजार में विदेशी वस्त्रों का ढेर लगाकर उन्हें अग्नि के समर्पित करने का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसकी अध्यक्षता लोकमान्य तिलक ने की थी। इससे सावरकर पूरे देश में चर्चा में आ गये। उस समय अंग्रेजों का सामना करना हर किसी के वश की बात नही थी। इसका परिणाम यह हुआ कि सावरकर को फग्र्यूसन कॉलेज के अधिकारियों ने कॉलेज से निष्कासित कर दिया। सावरकर के लिए यह कोई अप्रत्याशित बात नही थी, वह मनोवैज्ञानिक रूप से इस प्रतिक्रिया के लिए पूर्व से ही तैयार थे। तब उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात आपने ‘अभिनव भारत’ की स्थापना की। इस संगठन ने युवाओं में राष्ट्रभक्ति के भावों का संचार करके शिवाजी महाराज को अपना आदर्श मानकर देश को स्वतंत्र कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। इनके युवा साथी देशभक्ति के नशे में धुत्त होकर देश को स्वतंत्र कराने की शपथ लेते थे। उसके पश्चात अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए यथेष्ट प्रयास करते थे।

1906 ई. में तिलकजी के आग्रह पर श्याम जी कृष्ण वर्मा ने ‘शिवाजी छात्रवृत्ति’ सावरकर को देना स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात सावरकर 9 जून 1906 ई. को इंगलैंड के लिए प्रस्थान कर गये। उन दिनों लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए बड़ी ख्याति प्राप्त कर चुके थे। उनका संगठन भारतीय छात्रों को विशेष रूप से अपने देश की स्वतंत्रता के लिए तैयार करता था। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए उन दिनों ‘इंडिया हाउस’ का प्रयोग किया जाता था। सावरकर अपने अध्ययन के लिए इसी  ‘इंडिया हाउस’ में रहते थे। यहां पहुंचने के पश्चात उन पर वही मुहावरा लागू हो गया कि ‘जहां चाह-वहां राह।’ अर्थात जैसी उनकी विचार धारा थी और जैसा वह करना चाहते थे यहां उनसे वैसे ही लोग टकराने लगे। फलस्वरूप उनकी ‘मित्र मंडली’ का बड़ी तेजी से विस्तार हुआ। इस ‘मित्र मंडली’ में भाई परमानंद, सेनापति बापट, लाला हरदयाल, सरदार सिंह राणा, मैडमकामा और वीरेन्द्रनाथ चटटोपाध्याय जैसी अनेक विभूतियां और क्रांतिकारी व्यक्तित्व सम्मिलित थे। इसी ‘इंडिया हाउस’ मेें मोहनदास करमचंद गांधी भी 1906 में ही ठहरे थे।

क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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