1857 और महर्षि दयानन्द सरस्वती

  • 2015-12-10 08:30:16.0
  • निहाल सिंह आर्य

maharshi dayanandसन 1857 में अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई जीतने के बाद से भारत को पूर्णतया लूटा दबाया और लार्ड डलहौजी ने तो 20 हजार से अधिक पुरानी जमींदारियों को अपहरण नीति के तहत जब्त करके हर प्रकार से हमारा राजनैतिक, शैक्षिक, आर्थिक, धार्मिक, व्यापारिक और ओद्योगिक शोषण किया तो सारे देश में सर्वत्र अत्याचारों के विरुद्ध त्राहि-त्राहि मच गई। चारों ओर राजा, नवाबों और जनता में विद्रोह की अग्नि जलने लगी साधु जन आंदोलित हुए। राष्ट्रीय विपत्ति में साधु वर्ग सदा आगे रहा है।

सन 1857 में अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई जीतने के बाद से भारत को पूर्णतया लूटा दबाया और लार्ड डलहौजी ने तो 20 हजार से अधिक पुरानी जमींदारियों को अपहरण नीति के तहत जब्त करके हर प्रकार से हमारा राजनैतिक, शैक्षिक, आर्थिक, धार्मिक, व्यापारिक और ओद्योगिक शोषण किया तो सारे देश में सर्वत्र अत्याचारों के विरुद्ध त्राहि-त्राहि मच गई। चारों ओर राजा, नवाबों और जनता में विद्रोह की अग्नि जलने लगी साधु जन आंदोलित हुए। राष्ट्रीय विपत्ति में साधु वर्ग सदा आगे रहा है।निहालसिंह आर्य,

इन विद्रोही सन्यासी संतों की संख्या दो ढाई हजार थी जिनमें अगवा साढ़े चार सौ साधु थे जिन्होने सर्वखाप पंचायत के लेखानुसार स्वा0 विरजानन्द को फाल्गुन मास की पूर्णमासी स0 1907 विक्रमी (सन 1850 ई0) को मथुरा में ‘भारत गुरुदेव’ की पदवी दी थी इसलिए आर्य जगत में भी केवल इन्हीं के नाम में गुरु पद लगाया जाता है। उक्त संग्राम में इन संतों के निर्देशक सवा सौ साधु और इन सबके प्रमुख संयोजक प्रेरक वेद संस्कृत के मर्मज्ञ योगी सन्यासी चार महापुरुष थे जो बाल ब्रह्मचारी थे। प्रथम हिमालय के योगी 160 वर्षीय स्वामी ओमानन्द दूसरे उनके शिष्य कनखल के स्वामी पूर्णानन्द तीसरे उनके शिष्य मथुरा में स्वामी विरजानन्द और चौथे उनके शिष्य 33 वर्षीय गोल मुख वाले स्वामी दयानन्द सारे भारत में साधुओं और क्रांतिकारी  मई 1857 से नवंबर 1860 तक अज्ञात

महर्षि दयानन्द के जीवन में ये तीन वर्ष ‘अज्ञात वास’ कहलाते है परंतु पंचायती रिकार्ड और स्वामी वेदानन्द वेदवागीश के लेखानुसार इन तीन वर्षों में विशेषतया गुप्त रहकर स्वामी जी ने संग्राम की विफलता के कारणों को जानने और अँग्रेजी अत्याचारों से शोषित जनता की जानकारी लेने का सारे देश का गुप्त भ्रमण किया था जिसमें वे श्वेत अश्वारोही भी रहे थे। श्री स्वामी भीष्म आर्य भजनीक, श्री वेदवागीश और मथुरा गुरु विरजानन्द का लेखक मिर्जा अफजल बेग भी इस घटना की पुष्टि करते है। भालौट ग्राम के श्री सत्यमुनि (शेरसिंह) ने अपने दादा की बताई यह घटना मुझे भी 27 मई, 1978 और 1979 में दो बार मुझे भी नरेला में बताई थी। पं0 बस्तीराम ने दो में से गोल मुख वाले अश्वारोही का नाम स्वामी दयानन्द बताया था क्योंकि वे 1857 से 1869 तक कई बार महर्षि जी से मिले थे।

इन तीन वर्षों की अज्ञात यात्रा में भारत के बड़े-बड़े राजविद्रोहियों के क्रांति कार्यों की खुफिया जांच करने वाले स्वदेशी-विदेशी सरकारी कर्मचारियों से स्वामी दयानन्द की 31 बार मुठभेड़ हो गयी थी मगर आखिर में उनके तेज से हतप्रभ होकर क्षमा मांग झुककर चले जाते थे। एक बार सन 1858 में एक अंग्रेज नामालूम मुकाम पर 15 घुड़ सवारों सहित स्वामी जी के पास आ धमका और कुछ प्रशानोत्तर कर उनकी दिव्य तीव्र ज्योति से बेसुध होकर कदमों पर गिर पड़ा और क्षमा सहित मसीहा मानकर उन्हें 125 रुपए देकर चला गया। फिर नवंबर 1860 में स्वामी जी मथुरा में गुरु विरजानन्द से स्पष्टया मिले और ढाई वर्ष पर्यन्त अष्टाध्यायी, महाभाष्य, दर्शन, उपनिषद,  निरुक्त ग्रंथ पढे। व्याकरण पाठ के समय के अतिरिक्त समय एकांत में भी इन अपूर्व गुरु शिष्य का समागम होता था। जब गुरु विरजानन्द क्रांति पश्चात तीन वर्षों के देश भ्रमण की इतिवृत्ता दयानन्द जी से सुन चुके तब राजनयिक गोष्ठी के लिए दयानन्द को विश्वस्त समझ के एकांत में उनसे वार्तालाप करने लगे। स्वामी दयानन्द धार्मिक नेता ही नहीं थे वे सच्चे राजनैतिक नेता भी थे। एक बार हम उनके साथ जिला एटा में सौरों के मुकाम पर थे। उस वक्त उनसे एक साधु मिलने आया। उसने ढाई दिन रहकर उससे बातचीत करी थी। फिर चला गया था। श्री स्वामी जी से हमने इस साधु के हसब नसब की बात पूछी तब स्वामी जी मौन रहे। हमने बहुत ज्यादह इसरार किया और हल्फ लिया कि हम आपकी बात को नहीं बताएँगे।

इस पर स्वामी जी ने कहा – इनका पहला नाम गोविंदराम है और अब इनका नाम गुरु परमहंस है। ये जाति के ब्राह्मण है। इनका एक साथी रामसहायदास था जो अब से 8 महीने पहले मर गया है। उसने अपना नाम जगनानन्द धरा था।

जो जाति का कायस्थ था। हम सब लोग सन 1855 व 56 में गुरु विरजानन्द से आज्ञा लेकर भारत के साधु समाज के हुक्म से क्रांति यज्ञ में आहुति डालते रहे थे। ये रामसहायदास और गोविंदराम रानी झाँसी के यहाँ रहते थे। रानी के बलिदान होने पर ये दोनों साधु बन गए थे। इस तरह 125 हमारे पहले साथी थे। हम 1857 में कभी घोडों पर कभी पैदल चले थे और ऊंटों पर सन 1855 ई0 से सन 1858 के शुरू तक देश में क्रांति यज्ञ में आहुति डाली थी।  संभवत: यह उपरोक्त गोविन्दराम नाटोरे की धर्मात्मा रानी भवानी का वंशज राजा था।

2) इस संग्राम में भारतीयों की आपसी फूट, उत्तम अस्त्राभाव, अनुशासनहीनता तथा कुशल नेतृत्व के अभाव में निश्चित तिथि से पहले ही मेरठ में युद्ध छिड़ जाने से मिली असफलता से महर्षि जी बहुत दुखित हुए और इसलिए एक बार कहा था कि – सारे भारत में घूमने पर भी मुझे धनुर्वेद के केवल ढाई पन्ने ही मिले है यदि मैं जीवित रहा तो सारा धनुर्वेद प्रकाशित कर दूंगा। स्वामी जी ने यही बात दोबारा नवंबर 1878 ई0 में अजमेर में कही थी।

3) सन 1858 में क्रांति को कुचलने के बाद महारानी विक्टोरिया ने कहा था कि भारतीय प्रजा के साथ माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया का व्यवहार किया जाएगा। महर्षि जी ने इसीलिए सत्यार्थ-प्रकाश में लिखा है कि कोई कितना ही करे परंतु स्वदेशी राज्य सर्वोपरि उत्तम होता है.प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ भी विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं होता।

4) 1857 संग्राम में अँग्रेजी तोपों द्वारा महलों के तो बने, बाघेरों द्वारा लडऩे की घटना महर्षि ने स्वयं देखी थी इसलिए 11वें समुल्लास में लिख दिया कि जब सन 1857 ई0 के वर्षों में तोपों के मारे मन्दिर मूर्तियाँ अंग्रेजों ने उड़ा दी थी तब मूर्ति कहाँ गई थी। प्रत्युत बाघेर लोगों ने जितनी वीरता से लड़े, शत्रुओं को मारा परंतु मूर्ति एक मक्खी की टांग भी न तोड़ सकी। जो श्रीकृष्ण के सदृश (समान) कोई होता तो इनके धुर्रे उ?ा देता और ये भागते फिरते। यह घटना उनका प्रत्यक्षदर्शी होना सिद्ध करती है।

1) महर्षि जी के सेवक चौ0 नानकचन्द के शिष्य सौरम के इमदान खां की सन 1888 ई0 में लिखी कविता के 8 पद्यों में दो इस प्रकार है-दिल में शोले उठते है देव दयानन्द की याद के, पन्ने पलट कर देखलो उनकी जिंदगी की दाद के ।

1857 की आजादी की जंग में सब कुछ ही किया, मगर देश के कपूतों ने दगा करके हरवा दिया ॥

2) महर्षि दयानन्द के कई बार दर्शक, उपदेशश्रोता सूफी इमामबख्स के लम्बे लेख के प्रमाण में 1857 में अंग्रेजी अत्याचारों के विवरण में लिखा है कुछ साधु संतों का ऐसा भी कहना था के स्वामी दयानन्द जी गदर के क्रांतिकारियों के साथ रहे थे।

3) पं0 जयचन्द्र विद्यालंकार लिखते है कि बनारस के उदासी मठ के शास्त्री सत्यस्वरूप (लिखते है) का कथन है कि साधु संप्रदाय में तो बराबर यह अनुश्रुति चली आती है कि दयानन्द ने सन 1857 के संघर्ष में महत्वपूर्ण भाग लिया था।

क्रमश: