1857 और महर्षि दयानन्द सरस्वती-भाग-2

  • 2015-12-11 03:30:49.0
  • निहाल सिंह आर्य

dayanand4) श्री पृथ्वीसिंह मेहता जी लिखते है कि यह बात तो स्पष्ट हो ही सकती है कि क्रान्ति की तैयारियों आदि से उसे (दयानन्द को निकट परिचय करने का अवसर मिला। यह मान लेना आसान नहीं कि दयानन्द सदृश भावनाप्रवण और चेतनावान हृदय, मस्तिष्क का युवक उसके प्रभाव से अछूता बचा रहा हो।

5) यशस्वी विद्वान आर्यनेता पं0 जगदेवसिंह सिद्धांती ने सितंबर 1978 ई0 को मुझे यह बताया था कि 1963-64 में हलका मेहसाना के सांसद श्री मानसिंह के साथ मैं टंकारा और पोरबंदर गया था। पोरबंदर के लोगों ने तब बताया कि स्वामी दयानन्द की एक चि_ी 1857 में नाना साहब (स्वामी दिव्यानन्द) की रक्षार्थ पोरबंदर में सेठ के नाम आई थी। मानसिंह ने भी बताया था कि सिद्धपुर सौराष्ट्र के राजा ने हरयाणा से हजारों ब्राह्मण घर बुलाकर महर्षि दयानन्द के पूर्वजों सहित अपने राज्य में बसाए थे।

6) पं0 श्रीकृष्ण शर्मा आर्योप्देशक राजकोट लिखते है कि सन 1857 से पूर्व भारतीय क्रान्ति के एक सूत्रधार स्व0 श्री नाना साहब पेशवा ने बिठुर में महर्षि का संपर्क साधा था और स्वतन्त्रता संग्राम में विजयी बनने के लिए मार्गदर्शन भी मांगा था पर महर्षि की सलाह के अनुसार कार्यारम्भ करने से पूर्व ही मेरठ और दिल्ली में सशस्त्र क्रांति की ज्वाला भडक़ उठी थी। क्रान्ति के पश्चात नाना साहब पुन: महर्षि को मिले थे। सौराष्ट्र में ही उनके गुप्तावास के लिए महर्षि ने प्रबन्ध कर दिया था। (एक पत्र से)  वे साधु थे श्री नाना साहब पेशवा और वह पत्र था महर्षि दयानन्द का। ज्ज्. अंग्रेजी पत्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि छप्पनियां के दुष्काल में महर्षि दयानन्द का मार्गदर्शन न मिला होता तो लाखों मानव अपनी जान गवां बैठते।

7) पं0 सत्यकेतु विद्यालंकार जी इंगलेंड से 1957 की क्रांति में सक्रिय भाग लेने वाले कुछ साधु-फकीरों के नाम भी खोज कर लाये थे। उन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि ऋषि ने क्रान्ति में भाग ही नहीं लिया बल्कि नेतृत्व भी किया। फ्रांसीसी लेखक फोनटोम ने फ्रेंच भाषा के अपने उपन्यास ‘मरयम’ में कहा कि 1857 में पकड़े गए विद्रोही बाबा सोताराम ने बताया कि क्रान्ति का संचालक दशनामी और दयाल जी साधु है। एक गोल मुख वाले साधु द्वारा कई साधुओं सहित मेरठ की छावनी में प्रचार और गुप्त बैठक का प्रसंग है। आपको बता दें की ऊपर हमने ऋषि दयानन्द के क्रान्ति के वर्षों में बदले हुए नाम मूलशंकरा, रेवानन्द, दलालजी और गोल मुख वाला साधु आदि थे।

8) भोपाल से श्री आदित्यपाल सिंह आर्य भी अपने पत्र ‘वैदिक शिक्षा संदेश’ के कई अंकों में ‘1857 में महर्षि का सहयोग’ प्रकाशित कर चुके है। उन्होने एक पुस्तिका ‘ऋषि दयानन्द ने 1857 के प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य समर में सक्रिय भाग लिया था’ अलग प्रकाशित की है।

इनके अतिरिक्त श्री पं0 क्षितीश वेदलांकार, श्री जगन्नाथ विद्यालंकार आर्य मित्र में, डा0 रामेश्वर दयाल गुप्त सर्वहितकारी 14 फरवरी, 1985 में, वैध राम शंकर गुप्त मधुरलोक जनवरी 85 में, बनारसीसिंह जी आदि अनेकों विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से 1857 संग्राम में महर्षि जी का सहयोग मानते है।

कृपया पाठकगण स्वामी वेदानंद दयानन्द तीर्थ की लिखित स्वा0 विरजानन्द की जीवन गाथा और स्वा0 वेदानन्द वेदवागीश गुरुकुल झज्जर की पुस्तक सुधारक विशेषांक ‘देव पुरुष महर्षि दयानन्द सरस्वती’ अवश्य पढे। इनमें इस विषय के बहुत प्रमाण है। इस छोटे से लेख में तो स्वा0 ओमानन्द जी द्वारा संग्रहीत सर्व खाप पंचायत सौरम की ही सामग्री संकलित है। क्योंकि उनके पास तत्सम्बन्धी मूल हस्तलेख है। महर्षि जी ने सक्रिय राजनैतिक विधान का उपदेश ही सत्यार्थ-प्रकाश के छठे समुल्लास में किया है। वे वैदिक गणतंत्रीय राज विधायक थे जो मनुस्मृति आदि राज विधान के मर्मज्ञ महापंडित थे और राजस्थान के कई राजाओं को राज विधान मनुस्मृति प?ाई थी। उन्होने सकल वेद-विद्याओं तथा चक्रवर्ती आर्य राज्य के प्रचार प्रसार की बात अपने ग्रन्थों और आर्याभिविनय में लिखी है। मेरा उपरोक्त लेख हरयाणा के पंचायती रिकार्ड और आर्य विद्वानों के आधार पर लिखा संक्षिप्त लेख है।

निहाल सिंह आर्य ( 2 )

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